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Wednesday, February 13, 2019

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CISF की  2019 में 429 पोस्ट के लिए जो भर्ती खुली है उसके बारे विस्तृत जानकारी के लिए निचे बने लिंक पर क्लीक करे।

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Friday, January 25, 2019

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चौहान वंश और चौहानो की उत्पति | पृथ्वीराज चौहान एक वीर योद्धा

               चौहानो की उत्पति के बारे में और मूल स्थान दोनों ही काफी विवादस्पद है। चारणो और चंद्रबरदाई ने चौहानो को अग्निकुल का बताया है।  और हम्मीर महाकाव्य , हम्मीर रासो और पृथ्वीराज विजय के अनुसार चौहान सूर्यवंशी थे और कुछ इतिहासकारो तो चौहनो को विदेशियों की संतान मानते है। 
         चौहान वंस के संस्थापक के बारे में कहा जाता है की उसका नाम चाहमान था उसी के नाम पर चौहान  वंस की नीव पड़ी थी। चाहमान के वश में वासुदेव नाम एक व्यक्ति था जिसने साम्भर नामक स्थान पर चौहान राज्ये को पुनः स्थापित किया और वहा पर  एक झील का भी निर्माण करवाया था जिसे आज साम्भर झील के नाम से जाना जाने लगा। ये सब बात 550 ई. के आस पास की है। चौहान वंश में एक दुर्बलराज प्रथम जिसने गौड़ प्रदेश में कई धावे बोले जिसे बहुत सा धन इकठा किया जिससे चौहान राजे और मजबूत हो सका। दुर्बलराज का बेटे का नाम गूवक था जिसको बाद में गोविन्द राज नाम से जाने जाने लगा जिसने सिंध के मुस्लिम गवर्नर को हराया था। गूवक के बाद उसके पुत्र चन्द्रराज राज और बाद में गूवक द्वितीय ने राजे किया। गूवक द्वितीय के बाद उसका पुत्र चन्दन राज ने राजे किया उसने दिल्ली के तोमर नरेश रुद्रेण को हराया और मौत के घाट उतार दिया। चन्दन राज चौहान के बाद उसका पुत्र वाक्पतिराज प्रथम ने राज किया उसके समय में साम्भर काफी शक्तिशाली था उसने महाराज की पदवी भी धारण की थी।
          वाक्पतिराज प्रथम के बाद उसका पुत्र सिंहराज सिहासन पर बैठा। सिंहराज ने महाराजधिराज की उपाधि धारण की थी। उसने प्रतिहारो से जमकर मुकाबला किया और अपने को एक स्वतंत्र राजा घोषित कर दिया था। और सिंहराज ने दिल्ली के तोमरो को भी पराजित कर दिया था। सिंहराज के बाद विग्रहराज द्वितीय चौहानो का शासक बना उसने गुजरात के चालुक्य नरेश मूलराज प्रथम को पराजित किया था उसने मुस्लिम लूटेरों को भी पराजित किया था। विग्रहराज के बाद उसका छोटा भाई दुर्लबराज द्वितीय राजा बना उसने नाडौल के चौहान को पराजित किया। उसका उत्तराधिकारी गोविंदराज तृतीय उसने भी मुसलमानो से लोहा लिया उसके बाद वाक्पति द्वितीय शासक बना उसने मेवाड़ के शासक अम्बाप्रसाद को युद्ध में मार दिया था। वाक्पति के बाद वीर्यराम शासक बना वीर्यराम को नाडौल के चौहानो ने पराजित कर दिया था। उसके बाद मालवा के परमार नरेश भोज ने उसे पराजित करके मार दिया था। चामुण्डराय और सिंहघाट ने इसके बाद कुछ दिन तक राज्य किया था।  सिंहराज का उत्तराधिकारी दुर्लबराज तृतीय हुवा था बड़ा ही वीर शासक था उसने गुजरात नरेश को युद्ध में नाको चने चबवा दिए थे और वह भी एक युद्ध में मलेछो से युद्ध करता हुवा मारा गया उसके बाद उसके भाई वीर सींग और विग्रहराज तृतीय ने क्रमश: राज्ये किया था। विग्रहराज तृतीय के बाद उसका पुत्र पृथ्वीराज प्रथम जिसने 1105 ई. में राज्ये किया था उसने महाराजधिराज परमेश्वर की उपादि धारण की थी पृथ्वीराज के बाद उसका पुत्र अजयराज राजा बना वह भी एक पराक्रमी राजा था। उसने मालवा के परमार राजा नरवर्धन को हरा दिया था उसने एक बार गजनी की सेना को भी युद्ध में हरा दिया था। इसी अजयराज ने अजमेर शहर को बसाया था। उसके बाद उसका पुत्र अर्णोराज राजा बना जिसने 1133 ई. से 1155 ई. तक राज्ये किया यह अब तक का चौहानो में सबसे प्रतापी राजा था। अर्णोराज ने मुसलमानो को बुरी तरह हराया और उसने चालुक्यों को भी हराया था। परन्तु उसके बेटे जगदेव ने ही उसका वध कर दिया था।
             जगदेव ने  अपने पिता की हत्या करके राजसिहासन प्राप्त किया था पर वह भी ज्यादा दिनों तक शासन नहीं कर पाया उसको उसके भाई विग्रहराज ने युद्ध में मौत के घाट उतार डाला। विग्रहराज चतुर्थ ने 1158 ई. से 1163 ई. तक शासन किया विग्रहराज चतुर्थ ने तोमरो को पराजित करके दिल्ली और आसपास के क्षेत्र पर अपना कब्ज़ा कर लिया था और उसके बाद मुसलमानो को पराजित कर पंजाब के कुछ क्षेत्र को में समलित कर लिया था। विग्रहराज ने अपने कुल के शत्रु चालुक्यों को भी हराया था उसने कुमारपाल चालुक्य को हरा कर जालौर, पाली और नागौर को जित कर अपने राज्ये में मिला लिया था। उसने भड़ानकों को भी हराया था। विग्रहराज चतुर्थ  दुर्गो का निर्माण करवाया था। वह एक अच्छा  कवी भी था।
                  विग्रहराज के बढ़ अपर गांगेय शासक बना था परन्तु जल्दी ही उसकी मृत्यु ही गई थी। अपर गांगेय के अड़ पृथवीराज दिव्तीय शासक हुवा उसने 1169 ई. तक शासन किया था। उसने पंजाब में कई दुर्गो का निर्माण करवाया था उसने पंजाब में मुसलमानो से टक्कर ली थी। उसके मरने के बाद अर्णोराज के छोटे पुत्र सोमेश्वर राजा बना। सोमेश्वर का बचपन गुजरात में बिता था उसकी माँ कंचनदेवी चालुक्य राजा जयसिंह सिद्धराज की पुत्री थी। कुमारपाल और अर्णोराज के संबन्ध अच्छे नहीं थे परन्तु कुमारपाल ने सोमेश्वर का लालन पालन बहुत ही अच्छे से किया था। सोमेश्वर ने कुमारपाल की देख रेख में कई युद्धों में भाग लिया था जिसका अनुभव सोमेश्वर को हो गया था। सोमेश्वर का विवाह त्रिपुरी के शासक अचल की पुत्री कपूर्वी देवी से किया था।सोमेश्वर ने 1177 तक शासन किया था। सोमेश्वर के दो पुत्र थे क हरिराज और दूसरा पृथ्वीराज। ये वही पृथ्वीराज था जिसको हम पृथ्वीराज चौहान और पृथ्वीराज  तृतीये आदि नामो से जानते है। पृथ्वीराज चौहान के बारे में अगले ब्लॉग में बताऊंगा।

                                                                      प्रीतम राठौड़







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Wednesday, December 12, 2018

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जैता और कूंपा के पराकर्म का राजपूती इतिहास। मालदेव और शेरशाह।

कूंपा और जैता की वीरता का इतिहास। 

शेरशाह ने चौसा और कन्नौज के युद्ध हुमायूँ को हरा कर दिल्ली के राज्य पर अपना कब्ज़ा कर लिया था। तब से ही शेरशाह का मालदेव के साथ संघर्ष अवश्यम्भावी हो गया था। इसके अलावा जब मालदेव ने बीकानेर और मेड़ता से युद्ध लड़ कर कल्याणमल और वीरमदेव को अपना शत्रु बना लिया तब वे भी शेरशाह के पास पहुंच गए थे।  पड़ोसियों के इस तरह शेरशाह के पास चले जाने से शेरशाह की शक्ति बढ़ गयी और और इसके साथ ही दोनों को उत्तरी भारत का सर्वोच्च शासक बनना था इस कारण दोनों में युद्ध तो होना ही था क्यों की एक म्यान में तो तलवार नहीं ठहर सकती।
        इस प्रकार युद्ध तो सामने ी दिख रहा था परन्तु पहले शेरशाह भी हमला नहीं करना चाहता था। और मालदेव भी सतर्क था की शेरशाह किस मार्ग से हमला करेगा और इस कारण उसने अपने बीकानेर और अजमेर और मेड़ता के किलो को मजबूत कर लिया। परन्तु शेरशाह ने भी कूटनीति का सहारा लिया वह पहले भी चालाकी से हुमायूँ को दो बार हरा चूका था। 
       शेरशाह ने आगरा से 80000  सैनिक और अपना तोपखाना लेकर दिल्ली होते हुवे और नारनौल के रास्ते शेखावाटी में प्रवेश किया यहाँ से रेतीले मार्ग होते हुवे डीडवाना पंहुचा और वह कूंपा की सेना को हरा कर खदेड़ दिया तब कूंपा ने मालदेव को सूचित किया तो मालदेव गिरी नामक स्थान पर पंहुचा और शेरशाह बाबरा नामक स्थान पर पंहुचा दोनों के बिच लगभग 10 मील की दुरी थी।
         गिरी सुमेल युद्ध -शेरशाह ने राजपूतो के पहले वीरता के कई क़िस्से सुन रखे थे इसलिए वह अंदर से घबराया हुवा था। लगभग दोनों सेनाये एक माह तक आमने सामने रही इस बिच दोनों ने रेत के बोरो से और खाई खोद कर अपनी अपनी स्थिति को मजबूत बनाने का काम किया। दोनों में से पहले कोई हमला नहीं करना चाहता था।
           शेरशाह ने इससे पहले कई युद्ध चालाकी से जीते थे। उसको मालदेव ने एक माह का समय नहीं देना चाहिए था। शेरशाह ने इस एक माह में पहले तो अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया उसके बाद उसने कूटनीति का सहारा लेते हुवे चालाकी से मेड़ता के वीरमदेव से मालदेव के सरदार कूंपा और जैता के शिविर में 20-20 हजार रूपये रखवा दिए। वीरमदेव ने दोनों सरदारों को अपने लिए कुछ कम्बल और सिरोही की तलवारे खरीदने का आग्रह किया और दूसरी तरफ शेरशाह ने मालदेव के पास अपना गुप्तचर भेजा जो की ऐसा लगे की वो मालदेव को शेरशाह की रणनीति के बारे में बता रहा हो उस गुप्तचर ने मालदेव को बताया की शेरशाह ने उसके दोनों सरदारों जैता और कूंपा को पैसे देकर युद्ध में उसकी और से लड़ने का वादा लिया है। और उधर शेरशाह ने कुछ जाली पत्र तैयार करवाये उसमे लिखवाया गया की आप चिंता न करे हम मालदेव को युद्ध के समय पकड़ कर आपके सम्मुख लेकर आ जाये गे। इस प्रकार शेरशाह ने चालाकी से काम लिया और मालदेव के मन में संकोच पैदा कर दिया मालदेव ने तब अपने ही सरदारों जैता और कूपा पर शक होने लगा। 
            मालदेव ने अपना मानसिक सन्तुलन खो दिया और वह रात के अँधेरे में अपनी मुख्य सेना लेकर वहा से पलायन कर गया। उसके बाद में वहा पर अपनी 12 हजार सेना के साथ जैता और कूंपा रह गए। जैता और कूंपा राजपूत वीर थे उन्होने सोचा की जो विश्वासघात का आरोप उन पर लगा है उसे केवल शेरशाह से युद्ध करके ही गलत सिद्ध किया जा सकता है। जैता और कूंपा ने शेरशाह की सेना पर जोरदार प्रहार किया शेरशाह की सेना जो की 80 हजार थी 12 हजार राजपूत के सामने पहले हमले में टिक नहीं सकी और 7 मील पिछे हठ गयी इस हमले से शेरशाह घबरा कर बीच युद्ध मैदान में ही नवाज अदा करने लगा शेरशाह को लगने लगा की अब वह ये युद्ध नहीं जीत सकता लेकिन शेरशाह की किस्मत अच्छी थी उसी समय उसका सेनानायक जलालखां जुलानी अपनी सेना लेकर युद्ध मैदान में आ गया और युद्ध का माहौल ही बदल गया राजपूत 80 हजार सेना से लड़ते हुवे थक गए थे और शेरशाह के पास एक नई और फ्रेश सेना थी जिसकी मदद से शेरशाह ने राजपूत सेना हो हरा दिया। और जैता और कूंपा के साथ सारे के सारे राजपूत वीरगति को प्राप्त हुवे।
           गिरी सुमेल का युद्ध 1544 ई. में लड़ा गया था। इस युद्ध को अगर मालदेव अपनी पूरी सेना के साथ लड़ता तो आज का इतिहास ही कुछ और होता परन्तु मालदेव ने अपने सरदारों पर विश्वास नहीं करके बहुत बड़ी भूल की थी जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। इस युद्ध के बाद शेरशाह ने कहा था की में एक मुठी बाजरे के खातर लगभग अपना सारा दिल्ली का शासन खो देता। 
            इसके बाद शेरशाह ने अजमेर पर कब्ज़ा कर लिया और बाद में मेड़ता और बीकानेर को जीत कर के वीरमदेव को मेड़ता और कल्याणमल को बीकानेर दे दिया और दोनों राज्यों को अपने अधीन ही रखा और उसके बाद शेरशाह ने नागौर को भी अपने कब्जे में ले लिया और वहा से जोधपुर पर धावा बोल दिया और थोड़े से संघर्ष के बाद जोधपुर को भी जीत लिया गया। शेरशाह ने जोधपुर की बागडोर अपने विश्वासी खवाजाखा और ईशाखा को सोप दी और खुद दिल्ली चला गया। और उधर मालदेव ने स्थिति प्रतिकूल देखते हुवे वहा से सिवाना के पर्वतीय भाग में चला गया। 


              














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Monday, December 3, 2018

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शक्तिशाली राठौड़ मालदेव और शेरशाह सूरी और हुमायूँ

मालदेव और शेरशाह सूरी   

 मालदेव के बारे में जैसे की मैने अपने इससे पिछले पोस्ट में बताया की कैसे मालदेव ने अपनी शक्तिया बढ़ा ली थी। 1542 ई. तक मालदेव एक उत्तरी भारत का सबसे शक्तिशाली शासक बन गया था।  मालदेव के राज्य की सीमाएं उत्तर में बीकानेर और हिसार और पूर्व में बयाना और धौलपुर और दक्षिण में मेवाड़ और पश्चिम में जैसलमेर तक विस्तारित हो गयी थी। इस प्रकार मालदेव राठोड़ो का सबसे शक्तिशाली शासक बन गया था। उसने अपने सभी शत्रुओ को पराजित कर दिया था। मालदेव का उस समय कई दुर्गो पर कब्ज़ा था।  उन दुर्गो में मेड़ता, सिवाना, अजमेर, नागौर, जालौर, भाद्राजूण और बीकानेर जैसे सुदृढ़ दुर्ग थे।
Rav Maldev Jodhpur ka saktisali Shasak, Maldev or Shershah Suri
Rav Maldev Rathore
            परन्तु मालदेव ने अपने राठौड़ भाइयो से भी बैर मोल ले लिया जो उसे आगे चल कर भारी पड़ा उसके अलावा भाटियो से और मेवाड़ से और मेड़ता के शासको से जो नाराजगी उठानी पड़ी। ये सब की सब गलतिया आगे चल कर उस पर बहुत भरी पड़ी जिसका खामियाजा उसे अपना राज्ये को खोकर उठाना पड़ा। मालदेव अगर ये  सब गलतिया नहीं करता तो आज भारत का इतिहास अलग होता। 
            जिस समय मालदेव अपनी सर्वोच्चता की और अग्रसर था ठीक उसी समय दिल्ली की राजनीति में उथल पुथल मचा हुवा था। बाबर के स्थापित किये राज्ये को उसके बेटे हुमायूँ ने चौसा और कन्नौज के युद्ध में हर कर पूरी तरह खो दिया था। और इसी के साथ दिल्ली के राज्ये पर शेरशाह सूरी का आधिपत्य हो गया था। परन्तु शेरशाह को अभी भी हुमायूँ से डर था इसलिए उसने एक विश्वसनीय सेना को हुमायूँ के पीछे लगा दिया था।  इन  सभी मुसीबतो को झेलते हुवे हुमायूँ इधर उधर भटकते हुवे 1541 ई. के प्रारम्भ में भक्कर पहुँचा।
Badshsh Humayun, babar ka putra humayun
बादशाह  हुमायूँ 
 मालदेव और हुमायूँ -
             उसी समय शेरशाह सूरी एक विशाल सेना लेकर बंगाल में हुवे विद्रोह को दबाने गया  गया हुवा था। उस समय शेरशाह की सैन्य शक्ति पूरी तरह चारो और बिखरी हुवी थी। तब उस समय मालदेव ने मौके  का तकाजा लगते हुवे हुमायूँ को 20000 घुड़सवारों की सेना देने सन्देश हुमायूँ के पास भिजवाया था।  ये बात 1541 ई. की हे जब हुमायूँ भक्कर में डटा हुवा था।
                मालदेव ने अपने पड़ोसियों से जित कर अपने राज्ये को विस्तृत किया था। जिसके कारन वीरमदेव, कल्याणमल जैसे उसके पडोसी शत्रु शेरशाह के खेमे में शामिल हो गए थे। तब मालदेव को लगा की क्यों न मुझे भी शेरशाह के दुश्मन हुमायूँ को सैनिक सहायता देकर आने वाले खतरे को टाल लेना चाइये। इस समय मालदेव एक तीर से दो शिकार करना चाहता था। एक तो हुमायूँ के द्वारा शेरशाह को हरा कर उसे ख़तम कर दिया जाये उसके बाद हुमायूँ को सैनिक सहायता देने के बाद उसे अपने अधीन कर लिया जाये। और वैसे भी मालदेव को अपनी सर्वोचता सिद्ध करने के लिए दोनों को हराना तो पड़ता ही क्यों न पहले हुमायूँ और शेरशाह को लड़वा कर उनकी शक्ति को ही कम कर दिया जाये। जिसके कारण उसका काम और आसान हो जाये।
                   परन्तु ऐसा हो न सका क्यों की हुमायूँ उस समय की कीमत को  नहीं पहचान सका और सन्देश का कोई जबाब भी नहीं दिया। बल्कि हुमायूँ उस समय व्यर्थ के कामो में उलझा रहा उसने चोदह वर्षीय हमीदा बानू से निकाह कर लिया जिसके कारण उसके अपना भाई हिन्दाल भी उसका साथ छोड़ कर चला गया उसके और दोनों भाई कामरान और अस्करी पहले से ही उसके खिलाफ थे। अब हिन्दाल भी नाराज हो गया था।
                  हुमायूँ को उस समय मालदेव से सहायता ले लेनी चाहिए थी। परन्तु वह अब भी सोच रहा था की थट्टा के शासक शाह हुसैन की मदद से गुजरात को जीत लेगा और फिर वह से शक्तिशाली होकर शेरशाह जैसे शक्तिशाली शासक को पराजित कर देगा। हुमायूँ का पहले भी गुजरात के शासक बहादुर शाह के साथ लंबा संघर्ष चला था वह भी वह सफल नहीं हो सका था। तो इस प्रकार हुमायूँ व्यर्थ ही समय ख़राब करता रहा। इस कठिन समय में उसके भाइयो का विरोधी उसके बाद नासिर मिर्जा जैसे समर्थक एक एक करके उसका साथ छोड़ते चले गए और तब शाह हुसैन से भी हुमायूँ को कोई उम्मीद नहीं रही तब उसे मालदेव की याद आई और उसने मालदेव से सहायता लेने की सोची।
                  मालदेव से सहायता लेने के लिए हुमायूँ भक्कर से मारवाड़ की तरफ जाने की सोची और हुमायूँ वहा से उच्च गया उच्च से जैसलमेर होते हुवे मारवाड़ के फलौदी परगने में पंहुचा। वह से अतल खा को अपना दूत बना कर मालदेव के पास भेजा। मालदेव ने हुमायूँ को ठहरने की व्यवस्था तो कर दी परन्तु सैनिक सहायता देने का कोई आश्वासन दिया। इस बिच हुमायूँ के दूत ने मालदेव के इरादे ठीक नहीं होने की बात कही और इसके साथ ही हुमायूँ का पहले का एक सैनिक जो अब मालदेव की सेवा में था में था उसने एक सन्देश भिजवाया की आप जहा वहा से लोट जाये क्यों की यहाँ पर शेरशाह का एक दूत आया हे वो आप को बंदी बनाने की एवज  में बहुत सा धन और शेरशाह के अपने कुछ क्षेत्र देने की बात भी कह रहा है।
               हुमायूँ पहले से ही काफी विश्वासघात झेल चूका था इसलिए वह और कठिनाई में नहीं पड़ना चाहता था। इस कारन हुमायूँ ने वहा से चला जाना ही उचित समझा और हुमायूँ वहा से अगस्त 1542 ई. अमरकोट पंहुचा वहा के राणा ने हुमायूँ का आदर सहित आश्रय प्रदान किया और वही रहते अकबर का जन्म हुवा था।
            अब बात आती इतिहास की जिसमे कुछ इतिहास करो ने और मुख्य रूप से मुगलकालीन इतिहासकारो ने लिखा हे की मालदेव ने हुमायूँ को धोखा दिया ये बात पूर्णत असत्य है। इसके बहुत से कारण थे।  एक तो हुमायूँ का मालदेव के पास जाने समय पूर्णत ग़लत था उसने अपने समय कीमत नहीं जानी और व्यर्थ के कामो में उलझा रहा। मालदेव ने जिस समय सहायता देने का वादा किया था तब शेरशाह बंगाल अभियान पर था उसकी पूरी सेना बिखरी हुवी थी और हुमायूँ उसे हरा सकता था परन्तु बाद में शेरशाह ने बंगाल के विद्रोह को दबा कर अपने आप को एक शक्तिशाली शासक बना लिया था तब मालदेव ने सोचा की अब हुमायूँ को सैनिक सहायता देने से कोई फायदा नहीं क्यों की उसकी हार निश्चित है। मालदेव ने देखा की अब हुमायूँ के पास कोई बड़ी सेना नहीं है उसके सभी वफादार उसे छोड़ कर चले गए है इस कारण अगर वह सेना की सहायता देता है तो भी हुमायूँ की हर तो निश्चित है। क्यों वह शेरशाह से फालतू की दुश्मनी मोल ले। और एक बात और मालदेव एक राजपूत शासक था और राजपूत कभी भी अपने वचन को भंग नहीं करते है। इस कारण मुगलकालीन इतिहासकारो की बातो में दम नहीं लगता है।


                               By- Preetam Rathore
                 
                   
























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Friday, November 30, 2018

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मालदेव मारवाड़ का शाक्तिशाली शासक | राव मालदेव

राव मालदेव राठौड़ 

  राव गागा के बाद उनका बड़ा पुत्र  राव मालदेव सन 1532 में मारवाड़ गद्दी  पर विराजमान हुवा था।  राव मालदेव का जन्म 5  सितम्बर 1511 ई. में हुवा था।  उसके नाना सिरोही के जगमाल देवड़ा थे। राव मालदेव एक सुयोग्य और वीर सेनानायक था।  उसने अपने पिता राव गागा को  सोजत की विजय में अपनी वीरता से खुश कर दिया था।  इसके बाद गागा अपने पुत्र मालदेव को अपने साथ रखने लग गया था।  मालदेव ने इसके बाद सेवकी के युद्ध में भी विशेष पराक्रम  दिखा कर  जित लिया था।  खानवा के युद्ध में मालदेव ने  गागा के प्रतिनधि के रूप में भाग लिया था। और खूब पराकर्म  दिखाया था मालदेव उन सरदारों में से था जिसने राणा सांगा को सुरछित स्थान पर पहचा कर सांगा की रक्षा की थी।
Rav Maldev Rathore , Jodhpur ka saktisali Shasak
Rav Maldev Rathore

           गागा के मरने के बाद 1532 ई. में मालदेव  मारवाड़ का शासक बना तब उसे केवल जोधपुर और सोजत के दो ही परगने मिले थे। अन्य जगहों के राठौड़ ने अपने अपने अलग राज्य बना लिए थे ये सब छोटे छोटे राज्य पराक्रम से जीते थे। वे सब के सब राठौड़  जोधपुर के शासक को अपना नेता मानते थे। और संकट के समय अपना पूर्ण सहयोग भी करते थे परन्तु ये कहे की वे सभी के सभी स्वतंत्र  हो चुके थे तो गलत नहीं होगा। 
           मारवाड़ की राजधानी जोधपुर थी और मारवाड़ राठोड़ो के शासन के अधीन था। परन्तु  अन्य राठौड़ की तरह यहाँ भी कुछ जगह अन्य जातियों के सरदारों ने भी अपना शासन कायम कर रखा था। जैसे भाद्राजून में वीरा सिंघल , बिलाड़ा में सीरवी और नागौर में मुहम्मद खान , जैसलमेर में भाटी सरदार लूणकरण और डीडवाना फतेहपुर ओर झुंझुनू में कायमखानी मुसलमान, अजमेर में जगमाल और जालौर में बिहारी पठानों का शासन था। 
             लेकिन राव मालदेव एक महत्वकांक्षी शासक था वह उत्तरी भारत में राजपूतो की धाक वापिस जमाना चाहता था। इसके कारण उसने अपनी निरंतर सैनिक विजयो से और कूटनीति से मारवाड़ के राज्ये की सीमा का विस्तार किया और मारवाड़ को उत्तरी भारत का सबसे शक्तिशाली राज्ये बना लिया था। 
             
             मालदेव की विजये  और राज्ये विस्तार - मालदेव ने सबसे पहले अपने पडोसी राज्यों को जितने का काम किया उसने सबसे पहले 1533 ई. में फलौदी पर आक्रमण कर वह के भाटियो को पराजित किया। इसके बाद 1535 ई.  में दौलत खा को नागौर में पत्राजित का के नागौर को अपने कब्जे में ले लिया परन्तु वह पर मालदेव को पूरी तरह से सफलता नहीं मिली करीबन 2  साल के संघर्ष के बाद 1536 ई. में मालदेव ने पूर्ण रूप से नागौर पर अपना अधिकार कर लिया। और उसी समय 1536 ई. में ही बिलाड़ा पर आक्रमण कर के वहा  के सीरवियों को भी हरा दिया।  उसके बाद मालदेव ने सिवाना पर आक्रमण  करने के लिए सेना भेजी  परन्तु वह के शासक डूंगर सिंह ने सेना को हरा दिया इसके बाद 1538 ई. में राव मालदेव खुद सिवाना गया।  डूंगर सिंह ने डट कर मालदेव का सामना किया परन्तु अंत में रसद सामग्री खत्म हो जाने के कारन डूंगर सिंह भाग ने वह से पलायन कर दिया और इस प्रकार से सिवाना पर मारवाड़ का अधिकार हो गया।  
             भाद्राजून पर उस समय सींघलों का अधिकार था 1539 ई. में मेड़ता के वीरमदेव की सहायता से सींघलों के नेता वीरा को मार दिया और भाद्राजून पर भी अधिकार कर लिया।  और इसके बाद रायपुर के सींघलों के नेता को भी मार कर रायपुर मालदेव ने अधिकार कर लिया। 
             मालदेव ने इसके बाद 1540 सिंकंदर खा बिलोचियो को हरा कर उसे कैद कर लिया जिससे सिंकंदर की कुछ दिन बाद मृत्यु हो गई इस प्रकार जालोर पर भी मालदेव का अधिकार हो गया। इसके बारे में कहा जाता हे की किसी समय जब जालौर पर बिहारी पठानों का शासन था तब मालदेव ने ही सिंकदर खा को बिहारी पठानों के दमन करने में भरपूर सहायता की थी परन्तु सिंकदर खा इस बात को भूल कर मालदेव को खत्म  करने की बात करने लगा था इस बात का पता जब मालदेव को चला तो उसने जालौर  पर चढाई कर दी। 
            मेवाड़ की तत्कालीन स्थिति बहुत बुरी थी उस समय वह पर बनवीर कब्ज़ा था ये वही बनवीर था जिसने उदयसिंह को मारने  का असफल प्रयास किया था।  जिसको असफल करने में पन्ना धाय की सम्पूर्ण भूमिका थी।  तब बनवीर के शासन में मेवाड़ की कमजोरी का फायदा उठाते हुवे मालदेव ने जहाजपुर , बदनोर , कोशीथल और बीसलपुर,  मदारिया, नाडौल  पर अपना अधिकार कर के वह पर अपने सामंतो को जागीरों के रूप में दे दिया।  
               मेड़ता राव गागा समय यह क्षेत्र बरसिंह और दूदा को दिया गया था बरसिंह के बाद दूदा  और उसके बाद राव वीरमदेव वह का शासक बना परन्तु राव गागा के समय वीरमदेव और राजकुमार मालदेव में एक हाथी  को लेकर अनबन हो गयी थी।  जब राव मालदेव शासक बना तब उसने इस बात का बदला लेने की सोची और मेड़ता पर अधिकार करने का बहाना भी मिल गया परन्तु उस समय वीरमदेव ने राव मालदेव की अधीनता स्वीकार ली और खुद जोधपुर में आकर मालदेव की सेवा में लग गया। इस बिच मालदेव ने नागौर के खान और पवारो और बरसिंह के बेटो को भड़का कर मेड़ता पर चढाई करने के लिए बोला। जब इस बात का पता वीरमदेव को चला तो उसने बिना सूचित किये ही मेड़ता में जाकर खुसपैठियो को खदेड़ दिया। उसके बाद वीरमदेव ने अजमेर पर कब्ज़ा कर लिया जहा पर गुजरात के शासक बहादुरशाह ने अपने अधिकारी नियुक्त कर रखे थे। इस जित से मालदेव जल उठा उसने वीरमदेव को अजमेर मारवाड़ के अधीन करने को कहा इस पर वीरमदेव ने मना कर दिया तब मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया कुछ दिनों में ही मालदेव ने मेड़ता को अपने कब्जे में ले लिया।  इसके बाद वीरमदेव ने रीया पर आक्रमण कर दिया परन्तु वहा भी उसकी हार हुवी इस बात से चीड़ कर मालदेव ने 1538 ई. में एक शक्तिशाली सेना अजमेर भेजी और वीरमदेव को वह से भी हरा कर खदेड़ दिया गया।  और इसके बाद मालदेव ने सांभर , चाकसू , लालसोट आदि क्षत्रो पर अपना अधिकार कर लिया। 
            वीरमदेव इसके बाद कछवाहा शासक रायमल शेखावत के पास चला गया और वहा से वह से रणथम्भौर के मुस्लिम हाकिम की सहायता से शेरसाह सूरी के पास चला गया। 
             बीकानेर में उस समय उसके अपने भाईयों राठोड़ों का राज्ये था परन्तु मालदेव ने अपने महत्वाकांक्षा में इतना अँधा हो चूका था उसे ये सब दिखाई नहीं दिया और उसने बीकानेर पर भी 1541 ई. में कुम्पा के साथ एक विशाल सेना भेजी।  उस समय बीकानेर का शासन राव जैतसी के हाथ में था।  राव जैतसी ने अपने परिवार को सिरसा भेज दिया और खुद आगे बढ़  कर साहेबा नामक  जगह पर आकर मालदेव की सेना का प्रतिरोध किया फलस्वरूप दोनों सेना में बड़ा ही भयंकर युद्ध हुवा उसमे जैतसी  सहित सके प्रमुख सरदार मरे गए तीन दिन बाद मालदेव का बीकानेर पर कब्ज़ा हो गया।  इस विजय से खुश होकर कूम्पा को बीकानेर का प्रबंधन के साथ ही डीडवाना और झुंझुनू की जागीर भी दे दी।


                                                  By - Preetam Rathore
          
                
               

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Thursday, September 13, 2018

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राव जोधा जोधपुर के शासक | जोधपुर की स्थापना।

जोधपुर के संस्थापक - राव जोधा 

जिस समय मेवाड़ के सिसोदिया सरदारों ने 1438 ई. रणमल ओर अन्य राठोड़ी सरदारों को मार डाला तब उस समय रणमल के बड़ा बेटा जोधा अपने कुछ साथियों के साथ भाग निकला। 
      उधर मेवाड़ में कुम्भा का ताऊ चूंडा राणा का मुख्य सलाहकार बन गया अब वह मारवाड़ के राठोड़ी सरदारों से बदला लेना चाहता था। अंत: उसने इस समय नेता विहीन मारवाड़ की कमजोर स्थिति का फायदा उठाते हुवे मंडोर व बाकी मारवाड़ के अन्य नगरो पर कब्जा कर लिया तथा वहा पर अपने पुत्रो कुंतल,सुवा, झला ओर विक्रमादित्य आदि को मारवाड़ का राज्य सोप कर खुद मेवाड़ वापिस लौट आया। 
      उधर जोधा मारवाड़ में जगह जगह मेवाड़ी सैनिकों से संघर्ष करता रहा। उस बीच बीकानेर के पास काहुनी ग्राम में आश्रय लिया। यहां रहकर जोधा ने अपनी शक्ति को बढ़ाना सुरु किया।
rav Jodha jodhapur se sansthapak,  Bikaner ke santhapak rav bika ke pita
राव जोधा 

     मंडोर को जोधा द्वारा जितना - जोधा प्रतिभावान ओर एक महतवाकांक्षी व्यक्ति था। काहुनी में रहते हुवे उसने कई बार मंडोर जितने का प्रयास किया परन्तु सफल नहीं हुआ। क्यों की राणा कुम्भा ने मारवाड़ में कई जगह अपने थाने बिठा रखे थे। तब जोधा ने सीधा मंडोर पर आक्रमण करने की बजाए आस पास के क्षेत्र को जितने के बारे में रणनीति बनाई इस कार्य में हरबू सांखला ने जोधा की सबसे ज्यादा मदद की इसके अलावा अन्य राजपूतों को भी भी जोधा ने अपनी ओर मिला लिया। इससे जोधा की स्थिति कुछ सुधरी उसके बाद उसने चोकड़ी के थाने पर कब्जा कर लिया। इसके बाद जोधा ने रावल दूदा, राणा बिसलदेव, बनबिर भाटी आदि राणा कुम्भा के सहयोगियों को हरा दिया।
      जोधा ने बहुत जल्दी चौहानों ओर भाटी सरदारों के साथ मिलकर राणा कुम्भा से टक्कर लेने के लिए एक सेना तैयार कर ली। और जिस समय कुम्भा मालवा और गुजरात के सुलतानों से संघर्ष कर रहा था। तब जोधा मौके का फ़ायदा उठा कर मारवाड़ के विभिन्न क्षेत्रों पर कब्जा जमाने लगा। फिर कुछ दिनों बाद 1453-54 ई. में  जोधा ने अपनी पूर्वजों की राजधानी मंडोर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। मंडोर में स्थित सिसोदिया सरदारों को मौत के घाट उतार कर जोधा ने अपना पुराना हिसाब भी पूरा कर लिया था। 
       मेवाड़ के साथ समझोता- जब राणा कुम्भा को इस बारे में पता चला ती वह बहुत क्रुद्ध हुआ। जब मालवा ओर गुजरात की तरफ से दबाव कम हुआ तब राणा कुम्भा ने  जोधा के विरुद्ध प्रस्थान किया। उधर जोधा भी अपनी सेना के साथ आगे बढ़ा ओर पाली के निकट दोनों सेना एक दूसरे के आमने सामने थी। तब राणा कुम्भा की दादी ओर जोधा की भुवा हंसा बाई ने बीच बचाव करते हुवे दोनों में समझोता करवा कर सीमा निर्धारण करवाई थी। इस उपलक्ष्य में जोधा ने अपनी बेटी श्रंगार देवी का विवाह महाराणा कुम्भा के पुत्र रायमल के साथ कर दिया ओर सम्बन्ध ओर मजबूत कर लिए। 
        अब जोधा ने मारवाड़ के राज्य को ओर बढ़ाने पर ध्यान दिया उसने मेड़ता, पोकरण, फलोदी, भाद्राजून, शिव, सिवाना, सोजत, जैतारण और गोड़वाडा का क्षेत्र मारवाड़ में मिला कर अपने भाई ओर भतीजों को वहा पर नियुक्त कर दिया। परन्तु जब वह हिसार की तरफ बढ़ा तो अफगानों ने उसे रोक दिया।
           इसके बाद जोधा ने अपनी राजधानी को शत्रुओं से असुरक्षित देख कर उसकी बदलने की सोची। मंडोर से 7 किमी दूर एक चिड़िया नाथ कि टूक नामक पहाड़ी थी। उस पर जोधा ने अपनी नई राजधानी बनाने की सोची। परन्तु वहा पर एक साधु ने अपना दुणा रमा रखा था वह वहा से हिलने है लिए भी राजी नहीं हुआ। तब जोधा ने करनी माता जी की सहायता मागी जब माता देशनोक से चली तब उसी समय वह योगी अपना दुना अपनी चादर में डाल कर पास के गांव में यह कहते हुवे चला गया कि अब जाना पड़ेगा माता आ रही है।
          उसके बाद उस पहाड़ी पर करनी माता ने अपने हाथो से किले की निम लगाई। इस प्रकार 1459 ई. में जोधपुर का निर्माण शुरू हुआ। जोधा बड़े पुत्र बिका ने अपने पैतृक राज्य को छोड़ कर अपने चाचा कांदल व अपने भाहुबल से एक नए राज्य बीकानेर की स्थापना की थी। 1489 ई. में जोधा की मृत्यु हो गई। 
       जोधा के उतराधिकारी- जोधा के बाद उसके पुत्र सातल मारवाड़ का शासक बना। राव सातल ने अजमेर के मुस्लिम शासकों से निरन्तर संघर्ष किया उसने ही अजमेर के सूबेदार घुड़ले खा को मारा था उसके याद में मारवाड़ में एक त्यौहार मनाया जाता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई राव सुजा मारवाड़ का शासक बना। उसने पोकरण,जैतारण और बाड़मेर को जीत कर अपने राज्य में मिलाया।
  
          उसके शासन काल में बाड़मेर ओर पोकरण के सामंत विरोधी हो गए तथा मेड़ता का विरम देव स्वतंत्र शासक बन गया था। इसके अलावा बीकानेर के शासक व संस्थापक ने भी सुजा को बहुत परेशान किया। 15080 ई. में सुजा की मृत्यु हो गई।
         राव सुजा के बाद उसका पोता राव गांगा मारवाड़ का शासक बना। राव गांगा को उतराधिकारी के सिद्धांत के विरुद्ध राजा बनाया गया था। जब गांगा मारवाड़ का शासक बना तब उसकी स्थिति अच्छी नहीं थी। उसके राज्य के परगने मालानी,फलोदी,पोकरण,जैतारण , मेड़ता, सिवाना आदि सब लगभग स्वतंत्र हो गए थे। परन्तु वे अब भी मारवाड़ के केंद्रीय सता के अधीन थे। नागौर, सांचौर ओर जालौर के परगने मुसलमानो के अधिकार मे चले गए थे। लेकिन गांगा ने समय के अनुसार अपनी स्थिति को मजबूत कर के अपने राज्य का विस्तार किया।
            गांगा मेवाड़ के शासक राणा सांगा का साला थे। इन दोनों के बीच अच्छे सम्बन्ध थे।1511 ई.  जब सांगा ने इडर पर आक्रमण किया तब गांगा ने  उसकी सहायता की थी। ओर खानवा के युद्ध में भी गांगा ने अपने बेटे मालदेव को भेजा था। 1532 ई. में गांगा की मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि गांगा को उसके बेटे मालदेव ने महल कि खिड़की से धका देकर मार डाला पर ये सत्य नहीं है। क्यों की राजपूत में इस प्रकार के संस्कार नहीं पाए जाते। हो सकता है गांगा ने नसे में होने के कारण अपना संतुलन खो दिया हो ओर खिड़की से गिर गया हो।
         
          
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Sunday, September 2, 2018

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राठौड़ राज्य की स्थापना -सीहा | राठोड़ो का उत्पति | राठौड़ो का इतिहास।

 

सीहा-मारवाड़ के संस्थापक

   सीहा के बारे बहुत कम ऎतिहसिक जानकारी मिलती है। जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार सीहा वरदाई सेन का पोता व सेत राम का पुत्र था। परन्तु कर्नल टोड के अनुसार सीहा कन्नौज के अंतिम राजा जयचंद का पोता था।
     कन्नौज के पतन के बाद सीहा अपने बचे हुवे कुछ सैनिकों के साथ मरुभूमि की ओर चल पड़ा। 1212 ई. के आस पास सीहा ने मारवाड़ में प्रवेश किया। 
   उस समय इन स्थानों पर मुसलमानो का अधिकार था।इसके अलावा राजपूतों की अन्य जातियों का भी अपना स्वतंत्र राज्य था। कह सकते है पूरे मरुभूमि की स्थिति डावाडोल थी।
   सीहा एक महत्वाकाक्षी ओर वीर पुरुष था। जब वह मारवाड़ पहुंचा तो वहां के पालीवाल ब्राह्मण ने उससे मुसलमानो के विरुद्ध सहायता मांगी क्यों की यहा के मुसलमान उन्हें तंग करते थे। वे उनकी गायो को लूट ले जाते थे। तब सिहा ने मुसलमानो व अन्य राजपूतों जैसे कि बालेचा चौहान, मोहिल व गोहिल जाति के राजपूतों को हरा कर पालीवाल ब्राह्मणों की रक्षा की थी। ओर कहा जाता है कि सीहा मुसलमानो से लड़ाई करते हुवे ही वीरगति को प्राप्त हुवा।
     1273 ई. का सीहा का पाली के पास स्थित बिठू गाव में  लेख मिला है। इससे पता चलता है कि मरुभूमि में पाली ही राठौडो का पहला राज्य था।
राठौड़ वश के शिलालेख, राठौड़ वश की उत्पति
राठौड़ शिलालेख 


सीहा के  उतराधिकार - 
     आसथान - सीहा के बाद आसथान ने राठौडो का नेतृत्व किया था। उसने सबसे पहले गुंदोज को अपना केंद्र बनाया उसके बाद डाभी राजपूतों की सहायता से खेड पर अपना अधिकार जमाया। जलालुद्दीन ने पाली पर आक्रमण किया तो आसथान ने खेड़ से जाकर पाली के निकट युद्ध किया जिसमें वह अपने लगभग 140 साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हुआ। 
       धूहड़ - आसथान के बाद धूहड़ ने खेड़ को केंद्र बना कर मारवाड़ में अपने राज्य का विस्तार किया। उससे पहले धुहड़ ने कर्नाटक में जाकर वहा से एक  माता की मूर्ति को लाया जिसे कर्नाटक में चक्रेश्वरी माता के नाम से जाना जाता था। उस लाकर मारवाड़ के बाड़मेर के नगाना नामक गांव में स्थापित कर दिया।माता को उसके बाद नागणेची माता के नाम से जाना जाने लगा। ओर उसे ही राठौड़ अपनी कुल देवी मानने लगे। उसके बाद धूहड़ ने तूर्को व सरदारों से आस पास के 150 गावो जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया था। उसके बाद उसने मंडोर को भी प्रतिहारो से जीत लिया था परन्तु कुछ समय बाद प्रतिहारो ने धूहड़ को मार कर मडोर को वापिस प्राप्त कर लिया था।
       उसके बाद धूहड़ के पुत्र रायपाल ने एक बार फिर मंडोर जीत लिया परन्तु कुछ दिनों बाद ही वह प्रतिहारो से हार कर उसने मंडोर को खो दिया परन्तु उसके बाद  मालानी नामक  क्षेत्र को भाटियो से जीत लिया।परन्तु कुछ दिनों बाद रायपाल व उसका पुत्र भीम भाटियो के विरुद्ध संघर्ष करता हुवे वीरगति को प्राप्त हुए। 
      जालनसी- भीम व उसके पिता रायपाल की मृत्यु के बाद उनके उत्ताधिकारियों ने छापा मार नीति से अपने राज्य का विस्तार किया। जालनसी( रायपाल का वंशज)1328 ई. में भाटी व मुसलमानो की संयुक्त मोर्चे के सामने हार कर मार गया। उसका एक पुत्र था छडा बड़ा वीर था उसने उमरकोट के सोढो को ओर जैसलमेर के भाटियो को हराया ओर जालोर ओर नागौर के मुस्लिमो को दबाए रखा। परन्तु देवड़ा ओर सोनगरा चोहानो ने उसे अचानक घेर कर मार डाला था। 
        तीडा- 1344 छाडा का पुत्र टीडा ने राठौडो की शक्ति को बढ़ाया उसने सोनगरा चौहानों को हरा कर भीनमाल पर कब्जा किया। परंतु वह भी सिवाने की रक्षा करते समय वह मुस्लिम सेना से लड़ते हुवे वीरगति को प्राप्त हुआ।
         राव चुंडा-प्रतिभाशाली ओर महत्वाकांक्षी शासक था। 1383 ई. में जब उसके पिता विरमदेव की मृत्यु हुई तब चूंडा मात्र 6 साल का था।चूड़ा का प्रशिक्षण उसके चाचा मलिनाथ के देखरेख ने हुआ था। मलीनाथ चुंडा का एक वंशज था। मलीनाथ मलानी, महेवा व उसके आस पास के क्षेत्र पर अधिकार जमाए हुवे था। उसने चूड़ा को सलोड़ी गांव की जागीर दे दी ओर चूड़ा ने उस गांव को अपना केंद्र बना कर अपनी शक्ति बढ़ानी सुरु कर दी। चूड़ा ने परिहारों से साठ गाठ कर के मुसलमानो को हरा कर मंडोर को अपने कब्जे में कर लिया। इस अवसर परिहारों के राजा ने अपनी पुत्री का विवाह राव चूड़ा से कर दिया ओर दहेज में जीता हुआ मंडोर का राज्य दे दिया।
        मंडोर पर अधिकार करने के बाद उसने अपनी शक्ति को ओर बढा लिया। उसके बाद उसने सबसे पहले नागौर पर आक्रमण की तथा वहां के मुस्लिम शासक जलाल खा खोखर को मार डाला। इस प्रकार नागौर पर उसका अधिकार हो गया। इसके बाद चुंडा ने तुगलकों से अजमेर, डिडवाना, खाटू , सांभर व नाडोल आदि स्थानों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1411 में अपने विरोधी भाई जयसिंह से फलोदी को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया। परन्तु भाटियो ओर सांखला  ने मिल कर 1423 मे अचानक आक्रमण कर के उस मार डाला।
        राव रणमल ओर कान्हा - चुंडा के समय में ही मोहिलानी रानी ने अपने पुत्र कान्हा को उतराधिकारी घोषित करवा लिया था। परन्तु वह एक अयोग्य शासक निकला। इस बात सी नाराज होकर रनमल मेवाड़ के शासक लाखा की सरण में चला गया तथा रणमल ने अपनी बहिन हंसा बाई की विवाह भी राणा लाखा से करा दिया तथा उसने राणा लाखा से वचन लिया की उसके व मेरी बहन हंसा बाई से जो ओलाद होगी वहीं मेवाड़ राज्य की उतराधिकारी होगी। उधर सांखला व भाटियो ने कान्हा को चेन से नहीं रहने नहीं दिया। ओर कहा जाता है एक दिन उसके सैनिकों ने करनी माता की दो गायो को मार दिया था तब करणी माता ने उसके कर्मों को देखते हुवे उसको मारा था। उसके बाद उसके उतराधिकारी सता  ने अपने भाई रणधीर से लड़ बैठा। उसके बाद रणधीर ने रनमल को मेवाड़ से बुलाया तो रणमल ने राणा मोकल से सैनिक सहायता लेकर1427 ई. में मंडोर पर अपना अधिकार कर लिया था।
          राव चूंडा की मृत्यु के बाद लगभग 4  साल मारवाड़ मे उथल पुथल मची रही। राठौडो के हाथ से नागौर ओर जालोर निकल गए थे।  रणमल ने शीघ्र ही मंडोर के बाद पाली,सोजत, जैतारण और नाडोल पर अधिकार कर लिया। उसके बाद बिहारी पठानो को परास्त कर जालोर को भी अपने राज्य में मिला दिया।
       हंसा बाई के विवाह के बाद रणमल का मेवाड़ की राजनीति में हस्तक्षेप बड गया था। इस बीच 1433 ई. में राणा मोकल की हत्या कर दी गई। मोकल का पुत्र कुम्भा अभी छोटा था। उस समय रणमल ने मोकल के हत्यारों का दमन किया इससे रणमल रुतबा ओर बढ गया। इसके बाद रणमल ने मेवाड़ के महत्वपूर्ण पदों पर अपने राठोड़ी सरदारों को बिठा दिया। इस पर कुम्भा के बड़े होने पर मेवाड़ के सरदारों ने राठोड़ी सरदारों का विरोध करना शुरू कर दिया। मेवाड़ में अब दो गुट बन गए तथा एक दूसरे के लिए षडयंत्र रचने लगे थे। फिर कुछ दिनों बाद मेवाड़ी सरदारों का नेता राघवदेव मौत के घाट उतार दिया था। उससे मेवाड़ी सरदार रणमल से ओर चिड़ने लगे तब मेवाड़ी सरदारों ने व  राणा कुम्भा ने एक भरमली नामक दासी की सहायता से षडयंत्र रच कर रनमल को मार डाला। इसके बाद रणमल का बेटा जोधा उस समय जो मेवाड़ मे था अपने कुछ साथियों के साथ मारवाड़ की तरफ भाग निकला। 
जोधा के बाद का इतिहास आगे के भाग में पढ़े।
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