Thursday, July 26, 2018

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बल्लूजी चम्पावत और अमर सिंह राठौड़

बल्लूजी चम्पावत और अमर सिंह राठौड़ 

   ये उस समय की बात हे जब मुगल बादशाह शाहजहां के दरबार में राठौड़ वीर अमर सिंह एक ऊंचे पद के मनसबदार थे। एक दिन शाहजहाँ के साले सलावत खान ने भरे दरबार में अमर सिंह को हिन्दू होने कि वजह से अपमानित कर दिया। 
amar singh rathore salawat kha ko mara shah jahan ke darbar me
अमर सिंह राठौड़ 

     अमरसिंह राठौड़ के अन्दर राजपूती खून था…सैकड़ों सैनिको और शाहजहाँ के सामने भरे दरबार में अमरसिंह राठौड़ ने सलावत खान का सर काट फेंका ! शाहजहाँ कि सांस थम गयी..और इस शेर के कारनामे को देख कर मौजूद सैनिक वहाँ से भागने लगे हर तरफ अफरा तफरी मच गयी किसी की हिम्मत नहीं हुई कि अमर सिंह को रोके या उनसे कुछ कहे।
     मुसलमान दरबारी जान बचाकर इधर-उधर भागने लगे। शाहजहाँ ख़ुद जनानखानें में भाग गया। अमर सिंह निडर होकर अपनी हवेली लौट आये। अमर सिंह के साले का नाम था अर्जुन गौड़। वह बहुत लोभी और नीच स्वभाव का था। बादशाह ने उसे लालच दिया।
      इस पर उसने अमर सिंह को किसी तरह समझा-बुझा के और धोके से बादशाह के महल में ले गया।
वहां पर जब अमर सिंह आगरे के गढ़ के छोटे दरवाजे से होकर भीतर जा रहे थे, अर्जुन गौड़ ने पीठ पीछे से  धोके से वार करके उन्हें मार डाला। 
     ऐसे हिजड़ों जैसी बहादुरी से उनको मरवाकर शाहजहाँ बहुत प्रसन्न हुआ उसने अमर सिंह की लाश को
किले की बुर्ज पर टंगवा  दिया। धिक्कार हे उस बादशाह को जिसनें उसकी वीरता की कद्र करनें की बजाय उनकी लाश को इस प्रकार अपमानित करके बुर्ज पर टंगवा दिया था ! जब अमर सिंह की रानी ने जब ये समाचार सुना तो सती होने का निश्चय कर लिया, लेकिन पति की देह के बिना वो सती कैसे होती।
    रानी ने राजपूतों सरदारो को अपनें पति की देह लाने के लिए  प्रार्थना की परन्तु किसी ने हिम्मत नहीं कि और तब अन्त में उनको अमरसिंह के परम मित्र बल्लुजी चम्पावत की याद किया  और उनको बुलवाने के लिए दूत  को भेजा। 
    बल्लूजी अपनें प्रिय घोड़े पर सवार होकर पहुंचे जो उनको मेवाड़ के महाराणा नें बक्शा था। उन्होंने कहा- ‘राणी साहिबा’ मैं जाता हूं या तो मालिक की देह को लेकर आऊंगा या मेरी लाश भी वहीं गिरेगी।’ फिर वह राजपूत वीर घोड़े पर सवार हुआ और घोड़ा को दौड़ाता हुवा सीधे बादशाह के महल में पहुंच गया। महल का फाटक जैसे ही खुला द्वारपाल बल्लु जी को अच्छी तरह से देख भी नहीं पाये कि वो घोड़ा दौड़ाते हुवे वहाँ से  अंदर चले गए जहाँ पर वीर अमर सिंह की देह लटका रखी थी ! बुर्ज के ऊपर पहुंचते-पहुंचते सैकड़ों मुसलमान सैनिकों ने उन्हें घेर लिया पर बल्लूजी को अपनें मरने-जीने की चिन्ता नहीं थी। उन्होंने मुख से घोड़े की लगाम पकड़ रखी थी और दोनों हाथों से तलवार चला रहे थे ! उनका पूरा शरीर खून से लथपथ था।सैकड़ों नहीं,हजारों मुसलमान सैनिक उनके पीछे पड़े हुवे थे | जिनकी लाशें गिरती जा रही थीं और उन लाशों पर से बल्लूजी आगे बढ़ते जा रहा थे। वह मुर्दों की छाती पर होते बुर्ज पर चढ़ गये और अमर सिंह के शव को उठाकर अपनें कंधे पर रख लिया और एक हाथ से तलवार चलाते हुवे घोड़े पर उनके शव को रखकर आप भी बैठ गये और सीधे घोड़ा दौड़ाते हुवे गढ़ की बुर्ज के ऊपर चढ़ गए और वहाँ से घोड़े को नीचे कूदा दिया। नीचे मुसलमानों की सेना आने से पहले बिजली की भाँति अपने घोड़े सहित अमर सिंह की देह को लेकर वहाँ पहुँच चुके जहाँ रानी चिता सजाकर तैयार थी। अपने पति की देह को लेकर वो चिता में ख़ुशी ख़ुशी बैठ गई। 
    सती ने बल्लू जी को आशीर्वाद दिया- ‘बेटा ! गौ,ब्राह्मण,धर्म और सती स्त्री की रक्षा के लिए जो संकट उठाता है, भगवान उस पर प्रसन्न होते हैं। आपनें आज मेरी प्रतिष्ठा रखी है। आपका यश संसार में सदा अमर रहेगा।’ बल्लू चम्पावत मुसलमानों से लड़ते हुवे वीर गति को प्राप्त हुवे उनका दाह संस्कार यमुना के किनारे पर हुआ उनके और उनके घोड़े की याद में वहां पर स्म्रति स्थल बनवाया गया जो आज भी वहाँ मौजूद है। 
    जैसा इसी लेख में बताया गया है की बल्लूजी के पास जो धोड़ा था उस घोड़े को  मेवाड़ के महाराणा ने बक्शा था। तब बल्लूजी ने उनसें वादा किया की जब भी आप पर कोई विपति आये तो बल्लू को याद करना मैं हाजिर हो जाऊंगा।  
    उस के कुछ वक्त बाद में मेवाड़ पर ओरेंगजेब ने हमला कर दिया तो महाराणा ने उनको याद किया और  निवेदन किया की है बल्लूजी आज मेवाड़ को आपकी जरुरत है। तभी जनसमुदाय के समक्ष उसी घोड़े पर बल्लूजी दिखे और देबारी की घाटी युद्ध में मेवाड़ की जीत हुई। बल्लूजी उस युद्ध में एकबार फिर काम आ गए थे। देबारी में आज भी उनकी छतरी बनी हुई है। 
   बल्लूजी ने एक बार अपनी विपति के दिनों में लाडनूं के एक बनिये से कुछ कर्ज लिया इसके बदले में उन्होंने अपनी मूछ का बाल गिरवी रखा जो जीते जी तो वो छुड़ा न सके थे परन्तु उनकी छः पीढ़ी बाद में उनके वंसज हरसोलाव के ठाकुर सूरतसिंह जी ने उस मूछ के बाल को छुड़ाकर उसका विधि विधान के साथ दाह संस्कार करवाया था। और तब सारे बल्लुदासोत चम्पावत इकठे हुए और सारे शौक के दस्तूर पुरे किये गये। इस तरह एक राजपूत वीर का तीन बार दाह संस्कार हुआ जो हिन्दुस्थान के ही नही बल्कि सम्पूर्ण ब्रम्हाण्ड के इतिहास में इसके अलावा कही नही मिलता। 

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