Friday, July 20, 2018

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मारवाड और मेवाड़ के बीच सीमा निर्धारण का रोचक किस्सा।

             मेवाड़ और मारवाड के बीच स्थायी सीमा निर्धारण महाराणा कुम्भा और जोधा के वक़्त हुआ. पर इसके पीछे की कहानी बहुत रोचक है | सीमा तय करने के लिए जोधा और कुम्भा के मध्य संधि हुई. “जहाँ बबूल वहाँ मारवाड और जहाँ आम-आंवला वह मेवाड़” की तर्ज पर सीमा निर्धारण था | क्या था बबूल और आम का अर्थ इसे समझने के लिए संक्षिप्तता में रहते हुए इतिहास में चलते है.   
 
           सन 1290 में दिल्ली में जलालुद्धीन ने खिलजी वंश की स्थापना की उस वक्त मध्य भारत पर कब्ज़ा करने के लिए उसने अपने भतीजे और दामाद अलाउद्दीन खिलजी को मालवा पर आक्रमण के लिए भेजा था | बाद में विंध्यांचल पार कर उसने देवगिरी (वर्तमान औरंगाबाद) के राजा रामचंद्र को हराया था | और उसके तत्काल बाद उसने अपने श्वसुर जलालुद्दीन की हत्या कर खुद को दिल्ली का शासक घोषित कर दिया. 1303  में उसने चित्तोड़ पर आक्रमण किया. उस वक़्त चित्तोड़ पर रावल रतनसिंह का शासन था. सुल्तान लड़कर नहीं किन्तु छल कर सफल हुआ. यहाँ पहले पद्मिनी की शीशे में शक्ल देखने और बाद में जौहर का वृतांत है. चित्तोड़ किले की तलहटी में स्थित एक मकबरे में 11 मई 1303  में चित्तोड़ फतह का जिक्र है. अलाउद्दीन ने चित्तोड़ अपने बेटे खिजरखां को दिया और चित्तोड़ को नया नाम मिला खिजराबाद यह वर्णन गौरीशंकर ओझा की “उदयपुर राज्य का इतिहास” में मिलता है. बाद में खिजर दिल्ली चला गया और पीछे रतनसिंह के भांजे मालदेव सोनगरा को करदाता के रूप में चित्तोड़ सौंप दिया बाद में हम्मीर ने चित्तोड़ पर गुहिल वंश का राज पुनः कायम किया हम्मीर सिसोदा जागीर से था इसलिए यह वंश सिसोदिया कहलाया | 
         हम्मीर के समय से मेवाड़ के शासकों ने “राणा” उपाधि को धारण किया. हम्मीर ने मेवाड़ का पुनः उद्धार किया इडर, बूंदी आदि को पुनः जीता हम्मीर के बाद क्रमशः उसका पुत्र क्षैत्र सिंह और पौत्र लक्षसिंह राणा बना लक्षसिंह राना लाखा के नाम से प्रसिद्द हुआ था लाखा के वक़्त जावर गांव में चांदी की खाने निकल आई और मेवाड़ समृद्ध राज्य बन गया था | 
         इसके बाद की घटना बहुत अद्वितीय घटी थी  मंडोर के राठोड़ चूंडा ने अपने छोटे बेटे कान्हा को युवराज बनाना चाहा, जो उस वक़्त की शासन परंपरा के खिलाफ था | चूंडा का ज्येष्ठ पुत्र रणमल नाराज होकर राना लाखा की शरण में मेवाड़ आ गया और रणमल ने अपनी बहन हंसाबाई की की शादी मेवाड़ राज्य में करने की सोची | रणमल ने बहन हंसाबाई की शादी राणा लाखा से करवाने की चाह में राणा के पास शकुन का नारियल भेजा |  राणा उस वक्त दरबार में थे और उन्होंने ठिठोली में कह दिया कि उन्हें नहीं लगता कि उन जैसे बूढ़े के लिए ये नारियल आया है सो चूंडा आकर ये नारियल ले लेगा परन्तु रणमल ने कहा की ये नारियल आप ही के लिए है पर एक शर्त के साथ और शर्त ये है की आप और हंसाबाई की औलाद ही मेवाड़ की शासक बनेगी | इस पर लाखा के बेटे कुँवर चूंडा को लगा कि राणा की अनुरक्ति हंसाबाई की ओर है | और कुँवर चूंडा  ने आजीवन कुंवारा रहने और हंसाबाई का विवाह अपने पिता से करवाने की भीष्म प्रतिज्ञा की यह भी प्रण किया कि राणा और हंसाबाई की औलाद ही मेवाड़ की शासक बनेगी | 
         बाद में राणा लाखा और हंसाबाई के पुत्र मोकल को मेवाड़ की गद्दी मिली मरते वक़्त लाखा ने ये व्यवस्था की कि मेवाड़ के महाराणाओ की ओर से जो भी नियम पट्टे जारी किये जायेंगे उन पर भाले का राज्य-चिन्ह चूंडा और उसके वंशधर करेंगे, जो बाद में सलूम्बर के रावत कहलाये | 
        चूंडा ने मोकल के साथ मिलकर मेवाड़ को मजबूत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी किन्तु मामा रणमल को यह डर था कि चूंडा मौका मिलने पर मोकल को मरवा देगा उसने बहन हंसाबाई के कान भरे हंसाबाई ने चूंडा को विश्वासघाती बताकर मेवाड़ से चले जाने का आदेश दे दिया इसपर चूंडा ने मेवाड़ छोड़ने का निश्चय किया किन्तु इतिहासकार लिखते है कि उसने राजमाता से कहा था कि अगर मेवाड़ में कुछ भी बर्बादी हुई तो वह पुनः लौटेगा |  चूंडा अपने भाई राघवदेव को मोकल की व मेवाड़ रक्षा के लिए छोड़ कर चला गया

       चूंडा के जाते ही रणमल अपने भांजे मोकल का संरक्षक बन गया |  वह कई बार मोकल के साथ राजगद्दी पर बैठ जाता, जो मेवाड़ के सामंतो को बुरा लगता रणमल स्वयं मेवाड़ का सामंत तो हो गया पर उसका पूरा ध्यान अपने मूल राज्य मंडोर की तरफ था उसने मंडोर से राठौड़ो  को बुलाकर मेवाड़ के मुख्य पद उन्हें  दे दिए राजा श्यामलदास “वीर विनोद” में लिखते है कि मेवाडी सामंतों को यह नागवार गुज़रा उन्हें लगता था कि मेवाड़ अब मारवाड का हिस्सा हो जायेगा ! इसी दौरान जब मारवाड में उत्तराधिकार का संकट आया तो रणमल ने मेवाड़ की सेना के सहारे मंडोर पर कब्ज़ा कर लिया था | एक बार मौका पाकर रणमल ने भरे दरबार में चूंडा के भाई राघवदेव की हत्या कर दी थी |
       
       इस दौरान गुजरात के सुल्तान अहमदशाह के साथ हुवे युद्ध को मोकल ने स्व. राणा लाखा की पासबान (रखैल ) के दो बेटे चाचा और मेरा, की वीरता के दम पर जीत लिया| | परंन्तु चाचा और मेरा को यथोचित सम्मान नहीं मिला इसका कारण था रखैल के पुत्र होना | इसपर बाद में इन दोनों ने मोकल को धोखे से मार डाला इन सब घटनाक्रम के बाद मोकल का बेटा कुम्भकर्ण (कुम्भा) राणा बना था | 
      कुम्भा को भी रणमल का साथ मिला किन्तु एक बार रणमल ने नशे में किसी पासबान दासी भारमली को कह दिया कि वह कुम्भा को मार कर मेवाड़ और मारवाड का शासक बनेगा बात जब कुम्भा तक पहुंची तो उन्हें यह नागवार गुज़रा रणमल स्थिति भांपकर चित्तोड़ दुर्ग छोडकर तलहटी में आकर रहने लगा. इसी दौरान रणमल की हत्या कर दी गई उसका बेटा जोधा मेवाड़ से भाग गया | 
       बाद में मंडोर, लूनकरनसर, पाली, सोजत, मेड़ता आदि राज्य भी मेवाड़ के अंतर्गत हो गए थे ऐसे में जोधा छिपते छिपाते बीकानेर के पास आकर छिप गया था | और उसके बाद जोधा ने बड़ी  कठिनाइयों के बाद अपने पैतृक राज्य मडोर को पुनः अपने कब्ज़े में कर लिया था | किन्तु अपने पराक्रम के चलते वह धीरे धीरे सोजत, पाली तक बढ़ गया था | परन्तु  जब वह मेवाड़ के परगनो पर आक्रमण करने लगा तो बात ज्यादा बढ़ गयी |  यहाँ गौरीशंकर ओझा लिखते है कि एक बार जोश में आकर जोधा ने चित्तोड़ तक पर आक्रमण का फैसला कर लिया था वह अपने पिता की हत्या का बदला लेना चाहता था |  जोधपुर के चारण साहित्य में तो यहाँ तक कहा गया है कि जोधा ने चित्तोड़ पर आक्रमण कर उसके दरवाज़े जला दिए थे |  किन्तु इतिहासकार इसे सच नहीं मानते क्योंकि उस दौर में कुम्भा ने गुजरात, मंदसौर, सिरोही, बूंदी, डूंगरपुर आदि शासकों को हराया हुवा था | उस वक़्त मेवाड़ की सीमा सीहोर (म.प्र.) से हिसार (हरियाणा) तक थी | केवल हाडोती के रावल (हाडा) और मेरवाडा (अजयमेरू अथवा अजमेर)  स्वतंत्र थे | 
       जोधा द्वारा बार बार मेवाड़ के परगनो पर आक्रमण और कुम्भा द्वारा उसे कुछ नहीं कहे जाने को लेकर दोनों पक्षों के बीच संधि हुई जिसे राजमाता हंसाबाई ने करवाया था क्यों की कुम्भा उनका पौत्र था व जोधा  उनका भतीजा था | इतिहासकार लिखते है कि इस वक़्त जोधा ने अपनी बेटी “श्रृंगार देवी” का विवाह कुम्भा के बेटे रायमल से किया था |  अनुमान होता है कि जोधा ने मेवाड़ से अपना बैर बेटी देकर मिटाने की कोशिश की हो  किन्तु मारवाड के इतिहास में इस घटना का उल्लेख नहीं मिलता मेवाड़ के इतिहास (वीर विनोद एवं कर्नल जेम्स टोड) में इस विवाह के बारे में लिखा गया है बाद में इसी श्रृंगार देवी ने चित्तोड़ से बारह मील दूर गौसुंडी गांव में बावडी बनवाई,जिसके शिलालेख अब तक विद्यमान है | 
       मेवाड़ और मारवाड में हुई संधि में सीमा निर्धारण की आवश्यकता हुई तय किया गया कि जहाँ जहाँ तक बबूल के पेड है, वह इलाका मारवाड में और जहाँ जहाँ आम-आंवला के पेड हो, वह स्थान हमेशा के लिए मेवाड़ का रहेगा यह सीमांकन प्रायः स्थायी हो गया था इस सीमांकन के बाद सोजत (मेरवाडा-अजमेर के ब्यावर की सीमा तक) से थार (वर्तमान पाकिस्तान के सिंध की सीमा तक) तक और बीकानेर राज्य से बाड़मेर तक का भाग मारवाड के पास तथा बूंदी से लेकर वागड़ (डूंगरपुर) तथा इडर से मंदसौर तक का भाग मेवाड़ कहलाया | यद्यपि मेवाड़ इस से भी बड़ा था किन्तु आम्बेर (जयपुर), झुंझुनू, मत्स्य नगर, भरतपुर आदि मेवाड़ के करदाता के रूप में जाने जाते थे |  उस वक़्त मेवाड़ मुस्लिम त्रिकोण (नागौर- गुजरात-मालवा) के बीच फंसा राजपूती राज्य था |  एक समय में जब कुम्भा ने मालवा की राजधानी मांडू और गुजरात की राजधानी “अहमद नगर’ पर हमला किया तो दोनों मुस्लिम शासकों ने कुम्भा को “हिंदू-सुरत्राण” की उपाधि से नवाजा. इसके शिला लेख कुम्भलगढ़ और राणकपुर के मंदिरों में मिलते है | 
      बाद में कुम्भा के बेटे महाराणा सांगा ने जब खानवा में बाबर से युद्ध किया तो मारवाड ने मेवाड़ का बराबर साथ दिया था | इस से पता चलता है कि बैर सदा नहीं रहता है | जोधा ने भी मेवाड़ की ओर से आक्रमण के आशंकाएं खत्म होते ही जोधपुर (ईस्वी 1459 मे )नगर बसाया था 
कर्नल जेम्स टोड ने लिखा है, “इन राज्यों की गाथाओं में अनेक प्रकरण ऐसे है, जिसमे दोनों अपना उतावलापन और हर बात में अहंकार दिखाकर आपस में जूझने लगते है और बदला लिए बिना चैन से नहीं बैठते. परन्तु उसे पा जाने पर आपसी बैर भूल कर फिर एक हो जाते है.”

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