Thursday, September 13, 2018

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राव जोधा जोधपुर के शासक | जोधपुर की स्थापना।

जोधपुर के संस्थापक - राव जोधा 

जिस समय मेवाड़ के सिसोदिया सरदारों ने 1438 ई. रणमल ओर अन्य राठोड़ी सरदारों को मार डाला तब उस समय रणमल के बड़ा बेटा जोधा अपने कुछ साथियों के साथ भाग निकला। 
      उधर मेवाड़ में कुम्भा का ताऊ चूंडा राणा का मुख्य सलाहकार बन गया अब वह मारवाड़ के राठोड़ी सरदारों से बदला लेना चाहता था। अंत: उसने इस समय नेता विहीन मारवाड़ की कमजोर स्थिति का फायदा उठाते हुवे मंडोर व बाकी मारवाड़ के अन्य नगरो पर कब्जा कर लिया तथा वहा पर अपने पुत्रो कुंतल,सुवा, झला ओर विक्रमादित्य आदि को मारवाड़ का राज्य सोप कर खुद मेवाड़ वापिस लौट आया। 
      उधर जोधा मारवाड़ में जगह जगह मेवाड़ी सैनिकों से संघर्ष करता रहा। उस बीच बीकानेर के पास काहुनी ग्राम में आश्रय लिया। यहां रहकर जोधा ने अपनी शक्ति को बढ़ाना सुरु किया।
rav Jodha jodhapur se sansthapak,  Bikaner ke santhapak rav bika ke pita
राव जोधा 

     मंडोर को जोधा द्वारा जितना - जोधा प्रतिभावान ओर एक महतवाकांक्षी व्यक्ति था। काहुनी में रहते हुवे उसने कई बार मंडोर जितने का प्रयास किया परन्तु सफल नहीं हुआ। क्यों की राणा कुम्भा ने मारवाड़ में कई जगह अपने थाने बिठा रखे थे। तब जोधा ने सीधा मंडोर पर आक्रमण करने की बजाए आस पास के क्षेत्र को जितने के बारे में रणनीति बनाई इस कार्य में हरबू सांखला ने जोधा की सबसे ज्यादा मदद की इसके अलावा अन्य राजपूतों को भी भी जोधा ने अपनी ओर मिला लिया। इससे जोधा की स्थिति कुछ सुधरी उसके बाद उसने चोकड़ी के थाने पर कब्जा कर लिया। इसके बाद जोधा ने रावल दूदा, राणा बिसलदेव, बनबिर भाटी आदि राणा कुम्भा के सहयोगियों को हरा दिया।
      जोधा ने बहुत जल्दी चौहानों ओर भाटी सरदारों के साथ मिलकर राणा कुम्भा से टक्कर लेने के लिए एक सेना तैयार कर ली। और जिस समय कुम्भा मालवा और गुजरात के सुलतानों से संघर्ष कर रहा था। तब जोधा मौके का फ़ायदा उठा कर मारवाड़ के विभिन्न क्षेत्रों पर कब्जा जमाने लगा। फिर कुछ दिनों बाद 1453-54 ई. में  जोधा ने अपनी पूर्वजों की राजधानी मंडोर पर आक्रमण कर उसे जीत लिया। मंडोर में स्थित सिसोदिया सरदारों को मौत के घाट उतार कर जोधा ने अपना पुराना हिसाब भी पूरा कर लिया था। 
       मेवाड़ के साथ समझोता- जब राणा कुम्भा को इस बारे में पता चला ती वह बहुत क्रुद्ध हुआ। जब मालवा ओर गुजरात की तरफ से दबाव कम हुआ तब राणा कुम्भा ने  जोधा के विरुद्ध प्रस्थान किया। उधर जोधा भी अपनी सेना के साथ आगे बढ़ा ओर पाली के निकट दोनों सेना एक दूसरे के आमने सामने थी। तब राणा कुम्भा की दादी ओर जोधा की भुवा हंसा बाई ने बीच बचाव करते हुवे दोनों में समझोता करवा कर सीमा निर्धारण करवाई थी। इस उपलक्ष्य में जोधा ने अपनी बेटी श्रंगार देवी का विवाह महाराणा कुम्भा के पुत्र रायमल के साथ कर दिया ओर सम्बन्ध ओर मजबूत कर लिए। 
        अब जोधा ने मारवाड़ के राज्य को ओर बढ़ाने पर ध्यान दिया उसने मेड़ता, पोकरण, फलोदी, भाद्राजून, शिव, सिवाना, सोजत, जैतारण और गोड़वाडा का क्षेत्र मारवाड़ में मिला कर अपने भाई ओर भतीजों को वहा पर नियुक्त कर दिया। परन्तु जब वह हिसार की तरफ बढ़ा तो अफगानों ने उसे रोक दिया।
           इसके बाद जोधा ने अपनी राजधानी को शत्रुओं से असुरक्षित देख कर उसकी बदलने की सोची। मंडोर से 7 किमी दूर एक चिड़िया नाथ कि टूक नामक पहाड़ी थी। उस पर जोधा ने अपनी नई राजधानी बनाने की सोची। परन्तु वहा पर एक साधु ने अपना दुणा रमा रखा था वह वहा से हिलने है लिए भी राजी नहीं हुआ। तब जोधा ने करनी माता जी की सहायता मागी जब माता देशनोक से चली तब उसी समय वह योगी अपना दुना अपनी चादर में डाल कर पास के गांव में यह कहते हुवे चला गया कि अब जाना पड़ेगा माता आ रही है।
          उसके बाद उस पहाड़ी पर करनी माता ने अपने हाथो से किले की निम लगाई। इस प्रकार 1459 ई. में जोधपुर का निर्माण शुरू हुआ। जोधा बड़े पुत्र बिका ने अपने पैतृक राज्य को छोड़ कर अपने चाचा कांदल व अपने भाहुबल से एक नए राज्य बीकानेर की स्थापना की थी। 1489 ई. में जोधा की मृत्यु हो गई। 
       जोधा के उतराधिकारी- जोधा के बाद उसके पुत्र सातल मारवाड़ का शासक बना। राव सातल ने अजमेर के मुस्लिम शासकों से निरन्तर संघर्ष किया उसने ही अजमेर के सूबेदार घुड़ले खा को मारा था उसके याद में मारवाड़ में एक त्यौहार मनाया जाता है। उसकी मृत्यु के बाद उसका छोटा भाई राव सुजा मारवाड़ का शासक बना। उसने पोकरण,जैतारण और बाड़मेर को जीत कर अपने राज्य में मिलाया।
  
          उसके शासन काल में बाड़मेर ओर पोकरण के सामंत विरोधी हो गए तथा मेड़ता का विरम देव स्वतंत्र शासक बन गया था। इसके अलावा बीकानेर के शासक व संस्थापक ने भी सुजा को बहुत परेशान किया। 15080 ई. में सुजा की मृत्यु हो गई।
         राव सुजा के बाद उसका पोता राव गांगा मारवाड़ का शासक बना। राव गांगा को उतराधिकारी के सिद्धांत के विरुद्ध राजा बनाया गया था। जब गांगा मारवाड़ का शासक बना तब उसकी स्थिति अच्छी नहीं थी। उसके राज्य के परगने मालानी,फलोदी,पोकरण,जैतारण , मेड़ता, सिवाना आदि सब लगभग स्वतंत्र हो गए थे। परन्तु वे अब भी मारवाड़ के केंद्रीय सता के अधीन थे। नागौर, सांचौर ओर जालौर के परगने मुसलमानो के अधिकार मे चले गए थे। लेकिन गांगा ने समय के अनुसार अपनी स्थिति को मजबूत कर के अपने राज्य का विस्तार किया।
            गांगा मेवाड़ के शासक राणा सांगा का साला थे। इन दोनों के बीच अच्छे सम्बन्ध थे।1511 ई.  जब सांगा ने इडर पर आक्रमण किया तब गांगा ने  उसकी सहायता की थी। ओर खानवा के युद्ध में भी गांगा ने अपने बेटे मालदेव को भेजा था। 1532 ई. में गांगा की मृत्यु हो गई। कहा जाता है कि गांगा को उसके बेटे मालदेव ने महल कि खिड़की से धका देकर मार डाला पर ये सत्य नहीं है। क्यों की राजपूत में इस प्रकार के संस्कार नहीं पाए जाते। हो सकता है गांगा ने नसे में होने के कारण अपना संतुलन खो दिया हो ओर खिड़की से गिर गया हो।
         
          

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