Sunday, September 2, 2018

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राठौड़ राज्य की स्थापना -सीहा | राठोड़ो का उत्पति | राठौड़ो का इतिहास।

 

सीहा-मारवाड़ के संस्थापक

   सीहा के बारे बहुत कम ऎतिहसिक जानकारी मिलती है। जोधपुर राज्य की ख्यात के अनुसार सीहा वरदाई सेन का पोता व सेत राम का पुत्र था। परन्तु कर्नल टोड के अनुसार सीहा कन्नौज के अंतिम राजा जयचंद का पोता था।
     कन्नौज के पतन के बाद सीहा अपने बचे हुवे कुछ सैनिकों के साथ मरुभूमि की ओर चल पड़ा। 1212 ई. के आस पास सीहा ने मारवाड़ में प्रवेश किया। 
   उस समय इन स्थानों पर मुसलमानो का अधिकार था।इसके अलावा राजपूतों की अन्य जातियों का भी अपना स्वतंत्र राज्य था। कह सकते है पूरे मरुभूमि की स्थिति डावाडोल थी।
   सीहा एक महत्वाकाक्षी ओर वीर पुरुष था। जब वह मारवाड़ पहुंचा तो वहां के पालीवाल ब्राह्मण ने उससे मुसलमानो के विरुद्ध सहायता मांगी क्यों की यहा के मुसलमान उन्हें तंग करते थे। वे उनकी गायो को लूट ले जाते थे। तब सिहा ने मुसलमानो व अन्य राजपूतों जैसे कि बालेचा चौहान, मोहिल व गोहिल जाति के राजपूतों को हरा कर पालीवाल ब्राह्मणों की रक्षा की थी। ओर कहा जाता है कि सीहा मुसलमानो से लड़ाई करते हुवे ही वीरगति को प्राप्त हुवा।
     1273 ई. का सीहा का पाली के पास स्थित बिठू गाव में  लेख मिला है। इससे पता चलता है कि मरुभूमि में पाली ही राठौडो का पहला राज्य था।
राठौड़ वश के शिलालेख, राठौड़ वश की उत्पति
राठौड़ शिलालेख 


सीहा के  उतराधिकार - 
     आसथान - सीहा के बाद आसथान ने राठौडो का नेतृत्व किया था। उसने सबसे पहले गुंदोज को अपना केंद्र बनाया उसके बाद डाभी राजपूतों की सहायता से खेड पर अपना अधिकार जमाया। जलालुद्दीन ने पाली पर आक्रमण किया तो आसथान ने खेड़ से जाकर पाली के निकट युद्ध किया जिसमें वह अपने लगभग 140 साथियों के साथ वीरगति को प्राप्त हुआ। 
       धूहड़ - आसथान के बाद धूहड़ ने खेड़ को केंद्र बना कर मारवाड़ में अपने राज्य का विस्तार किया। उससे पहले धुहड़ ने कर्नाटक में जाकर वहा से एक  माता की मूर्ति को लाया जिसे कर्नाटक में चक्रेश्वरी माता के नाम से जाना जाता था। उस लाकर मारवाड़ के बाड़मेर के नगाना नामक गांव में स्थापित कर दिया।माता को उसके बाद नागणेची माता के नाम से जाना जाने लगा। ओर उसे ही राठौड़ अपनी कुल देवी मानने लगे। उसके बाद धूहड़ ने तूर्को व सरदारों से आस पास के 150 गावो जीत कर अपने राज्य का विस्तार किया था। उसके बाद उसने मंडोर को भी प्रतिहारो से जीत लिया था परन्तु कुछ समय बाद प्रतिहारो ने धूहड़ को मार कर मडोर को वापिस प्राप्त कर लिया था।
       उसके बाद धूहड़ के पुत्र रायपाल ने एक बार फिर मंडोर जीत लिया परन्तु कुछ दिनों बाद ही वह प्रतिहारो से हार कर उसने मंडोर को खो दिया परन्तु उसके बाद  मालानी नामक  क्षेत्र को भाटियो से जीत लिया।परन्तु कुछ दिनों बाद रायपाल व उसका पुत्र भीम भाटियो के विरुद्ध संघर्ष करता हुवे वीरगति को प्राप्त हुए। 
      जालनसी- भीम व उसके पिता रायपाल की मृत्यु के बाद उनके उत्ताधिकारियों ने छापा मार नीति से अपने राज्य का विस्तार किया। जालनसी( रायपाल का वंशज)1328 ई. में भाटी व मुसलमानो की संयुक्त मोर्चे के सामने हार कर मार गया। उसका एक पुत्र था छडा बड़ा वीर था उसने उमरकोट के सोढो को ओर जैसलमेर के भाटियो को हराया ओर जालोर ओर नागौर के मुस्लिमो को दबाए रखा। परन्तु देवड़ा ओर सोनगरा चोहानो ने उसे अचानक घेर कर मार डाला था। 
        तीडा- 1344 छाडा का पुत्र टीडा ने राठौडो की शक्ति को बढ़ाया उसने सोनगरा चौहानों को हरा कर भीनमाल पर कब्जा किया। परंतु वह भी सिवाने की रक्षा करते समय वह मुस्लिम सेना से लड़ते हुवे वीरगति को प्राप्त हुआ।
         राव चुंडा-प्रतिभाशाली ओर महत्वाकांक्षी शासक था। 1383 ई. में जब उसके पिता विरमदेव की मृत्यु हुई तब चूंडा मात्र 6 साल का था।चूड़ा का प्रशिक्षण उसके चाचा मलिनाथ के देखरेख ने हुआ था। मलीनाथ चुंडा का एक वंशज था। मलीनाथ मलानी, महेवा व उसके आस पास के क्षेत्र पर अधिकार जमाए हुवे था। उसने चूड़ा को सलोड़ी गांव की जागीर दे दी ओर चूड़ा ने उस गांव को अपना केंद्र बना कर अपनी शक्ति बढ़ानी सुरु कर दी। चूड़ा ने परिहारों से साठ गाठ कर के मुसलमानो को हरा कर मंडोर को अपने कब्जे में कर लिया। इस अवसर परिहारों के राजा ने अपनी पुत्री का विवाह राव चूड़ा से कर दिया ओर दहेज में जीता हुआ मंडोर का राज्य दे दिया।
        मंडोर पर अधिकार करने के बाद उसने अपनी शक्ति को ओर बढा लिया। उसके बाद उसने सबसे पहले नागौर पर आक्रमण की तथा वहां के मुस्लिम शासक जलाल खा खोखर को मार डाला। इस प्रकार नागौर पर उसका अधिकार हो गया। इसके बाद चुंडा ने तुगलकों से अजमेर, डिडवाना, खाटू , सांभर व नाडोल आदि स्थानों पर अधिकार कर लिया। इसके बाद 1411 में अपने विरोधी भाई जयसिंह से फलोदी को जीत कर अपने राज्य में मिला लिया। परन्तु भाटियो ओर सांखला  ने मिल कर 1423 मे अचानक आक्रमण कर के उस मार डाला।
        राव रणमल ओर कान्हा - चुंडा के समय में ही मोहिलानी रानी ने अपने पुत्र कान्हा को उतराधिकारी घोषित करवा लिया था। परन्तु वह एक अयोग्य शासक निकला। इस बात सी नाराज होकर रनमल मेवाड़ के शासक लाखा की सरण में चला गया तथा रणमल ने अपनी बहिन हंसा बाई की विवाह भी राणा लाखा से करा दिया तथा उसने राणा लाखा से वचन लिया की उसके व मेरी बहन हंसा बाई से जो ओलाद होगी वहीं मेवाड़ राज्य की उतराधिकारी होगी। उधर सांखला व भाटियो ने कान्हा को चेन से नहीं रहने नहीं दिया। ओर कहा जाता है एक दिन उसके सैनिकों ने करनी माता की दो गायो को मार दिया था तब करणी माता ने उसके कर्मों को देखते हुवे उसको मारा था। उसके बाद उसके उतराधिकारी सता  ने अपने भाई रणधीर से लड़ बैठा। उसके बाद रणधीर ने रनमल को मेवाड़ से बुलाया तो रणमल ने राणा मोकल से सैनिक सहायता लेकर1427 ई. में मंडोर पर अपना अधिकार कर लिया था।
          राव चूंडा की मृत्यु के बाद लगभग 4  साल मारवाड़ मे उथल पुथल मची रही। राठौडो के हाथ से नागौर ओर जालोर निकल गए थे।  रणमल ने शीघ्र ही मंडोर के बाद पाली,सोजत, जैतारण और नाडोल पर अधिकार कर लिया। उसके बाद बिहारी पठानो को परास्त कर जालोर को भी अपने राज्य में मिला दिया।
       हंसा बाई के विवाह के बाद रणमल का मेवाड़ की राजनीति में हस्तक्षेप बड गया था। इस बीच 1433 ई. में राणा मोकल की हत्या कर दी गई। मोकल का पुत्र कुम्भा अभी छोटा था। उस समय रणमल ने मोकल के हत्यारों का दमन किया इससे रणमल रुतबा ओर बढ गया। इसके बाद रणमल ने मेवाड़ के महत्वपूर्ण पदों पर अपने राठोड़ी सरदारों को बिठा दिया। इस पर कुम्भा के बड़े होने पर मेवाड़ के सरदारों ने राठोड़ी सरदारों का विरोध करना शुरू कर दिया। मेवाड़ में अब दो गुट बन गए तथा एक दूसरे के लिए षडयंत्र रचने लगे थे। फिर कुछ दिनों बाद मेवाड़ी सरदारों का नेता राघवदेव मौत के घाट उतार दिया था। उससे मेवाड़ी सरदार रणमल से ओर चिड़ने लगे तब मेवाड़ी सरदारों ने व  राणा कुम्भा ने एक भरमली नामक दासी की सहायता से षडयंत्र रच कर रनमल को मार डाला। इसके बाद रणमल का बेटा जोधा उस समय जो मेवाड़ मे था अपने कुछ साथियों के साथ मारवाड़ की तरफ भाग निकला। 
जोधा के बाद का इतिहास आगे के भाग में पढ़े।

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