Friday, November 30, 2018

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मालदेव मारवाड़ का शाक्तिशाली शासक | राव मालदेव

राव मालदेव राठौड़ 

  राव गागा के बाद उनका बड़ा पुत्र  राव मालदेव सन 1532 में मारवाड़ गद्दी  पर विराजमान हुवा था।  राव मालदेव का जन्म 5  सितम्बर 1511 ई. में हुवा था।  उसके नाना सिरोही के जगमाल देवड़ा थे। राव मालदेव एक सुयोग्य और वीर सेनानायक था।  उसने अपने पिता राव गागा को  सोजत की विजय में अपनी वीरता से खुश कर दिया था।  इसके बाद गागा अपने पुत्र मालदेव को अपने साथ रखने लग गया था।  मालदेव ने इसके बाद सेवकी के युद्ध में भी विशेष पराक्रम  दिखा कर  जित लिया था।  खानवा के युद्ध में मालदेव ने  गागा के प्रतिनधि के रूप में भाग लिया था। और खूब पराकर्म  दिखाया था मालदेव उन सरदारों में से था जिसने राणा सांगा को सुरछित स्थान पर पहचा कर सांगा की रक्षा की थी।
Rav Maldev Rathore , Jodhpur ka saktisali Shasak
Rav Maldev Rathore

           गागा के मरने के बाद 1532 ई. में मालदेव  मारवाड़ का शासक बना तब उसे केवल जोधपुर और सोजत के दो ही परगने मिले थे। अन्य जगहों के राठौड़ ने अपने अपने अलग राज्य बना लिए थे ये सब छोटे छोटे राज्य पराक्रम से जीते थे। वे सब के सब राठौड़  जोधपुर के शासक को अपना नेता मानते थे। और संकट के समय अपना पूर्ण सहयोग भी करते थे परन्तु ये कहे की वे सभी के सभी स्वतंत्र  हो चुके थे तो गलत नहीं होगा। 
           मारवाड़ की राजधानी जोधपुर थी और मारवाड़ राठोड़ो के शासन के अधीन था। परन्तु  अन्य राठौड़ की तरह यहाँ भी कुछ जगह अन्य जातियों के सरदारों ने भी अपना शासन कायम कर रखा था। जैसे भाद्राजून में वीरा सिंघल , बिलाड़ा में सीरवी और नागौर में मुहम्मद खान , जैसलमेर में भाटी सरदार लूणकरण और डीडवाना फतेहपुर ओर झुंझुनू में कायमखानी मुसलमान, अजमेर में जगमाल और जालौर में बिहारी पठानों का शासन था। 
             लेकिन राव मालदेव एक महत्वकांक्षी शासक था वह उत्तरी भारत में राजपूतो की धाक वापिस जमाना चाहता था। इसके कारण उसने अपनी निरंतर सैनिक विजयो से और कूटनीति से मारवाड़ के राज्ये की सीमा का विस्तार किया और मारवाड़ को उत्तरी भारत का सबसे शक्तिशाली राज्ये बना लिया था। 
             
             मालदेव की विजये  और राज्ये विस्तार - मालदेव ने सबसे पहले अपने पडोसी राज्यों को जितने का काम किया उसने सबसे पहले 1533 ई. में फलौदी पर आक्रमण कर वह के भाटियो को पराजित किया। इसके बाद 1535 ई.  में दौलत खा को नागौर में पत्राजित का के नागौर को अपने कब्जे में ले लिया परन्तु वह पर मालदेव को पूरी तरह से सफलता नहीं मिली करीबन 2  साल के संघर्ष के बाद 1536 ई. में मालदेव ने पूर्ण रूप से नागौर पर अपना अधिकार कर लिया। और उसी समय 1536 ई. में ही बिलाड़ा पर आक्रमण कर के वहा  के सीरवियों को भी हरा दिया।  उसके बाद मालदेव ने सिवाना पर आक्रमण  करने के लिए सेना भेजी  परन्तु वह के शासक डूंगर सिंह ने सेना को हरा दिया इसके बाद 1538 ई. में राव मालदेव खुद सिवाना गया।  डूंगर सिंह ने डट कर मालदेव का सामना किया परन्तु अंत में रसद सामग्री खत्म हो जाने के कारन डूंगर सिंह भाग ने वह से पलायन कर दिया और इस प्रकार से सिवाना पर मारवाड़ का अधिकार हो गया।  
             भाद्राजून पर उस समय सींघलों का अधिकार था 1539 ई. में मेड़ता के वीरमदेव की सहायता से सींघलों के नेता वीरा को मार दिया और भाद्राजून पर भी अधिकार कर लिया।  और इसके बाद रायपुर के सींघलों के नेता को भी मार कर रायपुर मालदेव ने अधिकार कर लिया। 
             मालदेव ने इसके बाद 1540 सिंकंदर खा बिलोचियो को हरा कर उसे कैद कर लिया जिससे सिंकंदर की कुछ दिन बाद मृत्यु हो गई इस प्रकार जालोर पर भी मालदेव का अधिकार हो गया। इसके बारे में कहा जाता हे की किसी समय जब जालौर पर बिहारी पठानों का शासन था तब मालदेव ने ही सिंकदर खा को बिहारी पठानों के दमन करने में भरपूर सहायता की थी परन्तु सिंकदर खा इस बात को भूल कर मालदेव को खत्म  करने की बात करने लगा था इस बात का पता जब मालदेव को चला तो उसने जालौर  पर चढाई कर दी। 
            मेवाड़ की तत्कालीन स्थिति बहुत बुरी थी उस समय वह पर बनवीर कब्ज़ा था ये वही बनवीर था जिसने उदयसिंह को मारने  का असफल प्रयास किया था।  जिसको असफल करने में पन्ना धाय की सम्पूर्ण भूमिका थी।  तब बनवीर के शासन में मेवाड़ की कमजोरी का फायदा उठाते हुवे मालदेव ने जहाजपुर , बदनोर , कोशीथल और बीसलपुर,  मदारिया, नाडौल  पर अपना अधिकार कर के वह पर अपने सामंतो को जागीरों के रूप में दे दिया।  
               मेड़ता राव गागा समय यह क्षेत्र बरसिंह और दूदा को दिया गया था बरसिंह के बाद दूदा  और उसके बाद राव वीरमदेव वह का शासक बना परन्तु राव गागा के समय वीरमदेव और राजकुमार मालदेव में एक हाथी  को लेकर अनबन हो गयी थी।  जब राव मालदेव शासक बना तब उसने इस बात का बदला लेने की सोची और मेड़ता पर अधिकार करने का बहाना भी मिल गया परन्तु उस समय वीरमदेव ने राव मालदेव की अधीनता स्वीकार ली और खुद जोधपुर में आकर मालदेव की सेवा में लग गया। इस बिच मालदेव ने नागौर के खान और पवारो और बरसिंह के बेटो को भड़का कर मेड़ता पर चढाई करने के लिए बोला। जब इस बात का पता वीरमदेव को चला तो उसने बिना सूचित किये ही मेड़ता में जाकर खुसपैठियो को खदेड़ दिया। उसके बाद वीरमदेव ने अजमेर पर कब्ज़ा कर लिया जहा पर गुजरात के शासक बहादुरशाह ने अपने अधिकारी नियुक्त कर रखे थे। इस जित से मालदेव जल उठा उसने वीरमदेव को अजमेर मारवाड़ के अधीन करने को कहा इस पर वीरमदेव ने मना कर दिया तब मालदेव ने मेड़ता पर आक्रमण कर दिया कुछ दिनों में ही मालदेव ने मेड़ता को अपने कब्जे में ले लिया।  इसके बाद वीरमदेव ने रीया पर आक्रमण कर दिया परन्तु वहा भी उसकी हार हुवी इस बात से चीड़ कर मालदेव ने 1538 ई. में एक शक्तिशाली सेना अजमेर भेजी और वीरमदेव को वह से भी हरा कर खदेड़ दिया गया।  और इसके बाद मालदेव ने सांभर , चाकसू , लालसोट आदि क्षत्रो पर अपना अधिकार कर लिया। 
            वीरमदेव इसके बाद कछवाहा शासक रायमल शेखावत के पास चला गया और वहा से वह से रणथम्भौर के मुस्लिम हाकिम की सहायता से शेरसाह सूरी के पास चला गया। 
             बीकानेर में उस समय उसके अपने भाईयों राठोड़ों का राज्ये था परन्तु मालदेव ने अपने महत्वाकांक्षा में इतना अँधा हो चूका था उसे ये सब दिखाई नहीं दिया और उसने बीकानेर पर भी 1541 ई. में कुम्पा के साथ एक विशाल सेना भेजी।  उस समय बीकानेर का शासन राव जैतसी के हाथ में था।  राव जैतसी ने अपने परिवार को सिरसा भेज दिया और खुद आगे बढ़  कर साहेबा नामक  जगह पर आकर मालदेव की सेना का प्रतिरोध किया फलस्वरूप दोनों सेना में बड़ा ही भयंकर युद्ध हुवा उसमे जैतसी  सहित सके प्रमुख सरदार मरे गए तीन दिन बाद मालदेव का बीकानेर पर कब्ज़ा हो गया।  इस विजय से खुश होकर कूम्पा को बीकानेर का प्रबंधन के साथ ही डीडवाना और झुंझुनू की जागीर भी दे दी।


                                                  By - Preetam Rathore
          
                
               

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