Wednesday, December 12, 2018

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जैता और कूंपा के पराकर्म का राजपूती इतिहास। मालदेव और शेरशाह।

कूंपा और जैता की वीरता का इतिहास। 

शेरशाह ने चौसा और कन्नौज के युद्ध हुमायूँ को हरा कर दिल्ली के राज्य पर अपना कब्ज़ा कर लिया था। तब से ही शेरशाह का मालदेव के साथ संघर्ष अवश्यम्भावी हो गया था। इसके अलावा जब मालदेव ने बीकानेर और मेड़ता से युद्ध लड़ कर कल्याणमल और वीरमदेव को अपना शत्रु बना लिया तब वे भी शेरशाह के पास पहुंच गए थे।  पड़ोसियों के इस तरह शेरशाह के पास चले जाने से शेरशाह की शक्ति बढ़ गयी और और इसके साथ ही दोनों को उत्तरी भारत का सर्वोच्च शासक बनना था इस कारण दोनों में युद्ध तो होना ही था क्यों की एक म्यान में तो तलवार नहीं ठहर सकती।
        इस प्रकार युद्ध तो सामने ी दिख रहा था परन्तु पहले शेरशाह भी हमला नहीं करना चाहता था। और मालदेव भी सतर्क था की शेरशाह किस मार्ग से हमला करेगा और इस कारण उसने अपने बीकानेर और अजमेर और मेड़ता के किलो को मजबूत कर लिया। परन्तु शेरशाह ने भी कूटनीति का सहारा लिया वह पहले भी चालाकी से हुमायूँ को दो बार हरा चूका था। 
       शेरशाह ने आगरा से 80000  सैनिक और अपना तोपखाना लेकर दिल्ली होते हुवे और नारनौल के रास्ते शेखावाटी में प्रवेश किया यहाँ से रेतीले मार्ग होते हुवे डीडवाना पंहुचा और वह कूंपा की सेना को हरा कर खदेड़ दिया तब कूंपा ने मालदेव को सूचित किया तो मालदेव गिरी नामक स्थान पर पंहुचा और शेरशाह बाबरा नामक स्थान पर पंहुचा दोनों के बिच लगभग 10 मील की दुरी थी।
         गिरी सुमेल युद्ध -शेरशाह ने राजपूतो के पहले वीरता के कई क़िस्से सुन रखे थे इसलिए वह अंदर से घबराया हुवा था। लगभग दोनों सेनाये एक माह तक आमने सामने रही इस बिच दोनों ने रेत के बोरो से और खाई खोद कर अपनी अपनी स्थिति को मजबूत बनाने का काम किया। दोनों में से पहले कोई हमला नहीं करना चाहता था।
           शेरशाह ने इससे पहले कई युद्ध चालाकी से जीते थे। उसको मालदेव ने एक माह का समय नहीं देना चाहिए था। शेरशाह ने इस एक माह में पहले तो अपनी स्थिति को मजबूत कर लिया उसके बाद उसने कूटनीति का सहारा लेते हुवे चालाकी से मेड़ता के वीरमदेव से मालदेव के सरदार कूंपा और जैता के शिविर में 20-20 हजार रूपये रखवा दिए। वीरमदेव ने दोनों सरदारों को अपने लिए कुछ कम्बल और सिरोही की तलवारे खरीदने का आग्रह किया और दूसरी तरफ शेरशाह ने मालदेव के पास अपना गुप्तचर भेजा जो की ऐसा लगे की वो मालदेव को शेरशाह की रणनीति के बारे में बता रहा हो उस गुप्तचर ने मालदेव को बताया की शेरशाह ने उसके दोनों सरदारों जैता और कूंपा को पैसे देकर युद्ध में उसकी और से लड़ने का वादा लिया है। और उधर शेरशाह ने कुछ जाली पत्र तैयार करवाये उसमे लिखवाया गया की आप चिंता न करे हम मालदेव को युद्ध के समय पकड़ कर आपके सम्मुख लेकर आ जाये गे। इस प्रकार शेरशाह ने चालाकी से काम लिया और मालदेव के मन में संकोच पैदा कर दिया मालदेव ने तब अपने ही सरदारों जैता और कूपा पर शक होने लगा। 
            मालदेव ने अपना मानसिक सन्तुलन खो दिया और वह रात के अँधेरे में अपनी मुख्य सेना लेकर वहा से पलायन कर गया। उसके बाद में वहा पर अपनी 12 हजार सेना के साथ जैता और कूंपा रह गए। जैता और कूंपा राजपूत वीर थे उन्होने सोचा की जो विश्वासघात का आरोप उन पर लगा है उसे केवल शेरशाह से युद्ध करके ही गलत सिद्ध किया जा सकता है। जैता और कूंपा ने शेरशाह की सेना पर जोरदार प्रहार किया शेरशाह की सेना जो की 80 हजार थी 12 हजार राजपूत के सामने पहले हमले में टिक नहीं सकी और 7 मील पिछे हठ गयी इस हमले से शेरशाह घबरा कर बीच युद्ध मैदान में ही नवाज अदा करने लगा शेरशाह को लगने लगा की अब वह ये युद्ध नहीं जीत सकता लेकिन शेरशाह की किस्मत अच्छी थी उसी समय उसका सेनानायक जलालखां जुलानी अपनी सेना लेकर युद्ध मैदान में आ गया और युद्ध का माहौल ही बदल गया राजपूत 80 हजार सेना से लड़ते हुवे थक गए थे और शेरशाह के पास एक नई और फ्रेश सेना थी जिसकी मदद से शेरशाह ने राजपूत सेना हो हरा दिया। और जैता और कूंपा के साथ सारे के सारे राजपूत वीरगति को प्राप्त हुवे।
           गिरी सुमेल का युद्ध 1544 ई. में लड़ा गया था। इस युद्ध को अगर मालदेव अपनी पूरी सेना के साथ लड़ता तो आज का इतिहास ही कुछ और होता परन्तु मालदेव ने अपने सरदारों पर विश्वास नहीं करके बहुत बड़ी भूल की थी जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। इस युद्ध के बाद शेरशाह ने कहा था की में एक मुठी बाजरे के खातर लगभग अपना सारा दिल्ली का शासन खो देता। 
            इसके बाद शेरशाह ने अजमेर पर कब्ज़ा कर लिया और बाद में मेड़ता और बीकानेर को जीत कर के वीरमदेव को मेड़ता और कल्याणमल को बीकानेर दे दिया और दोनों राज्यों को अपने अधीन ही रखा और उसके बाद शेरशाह ने नागौर को भी अपने कब्जे में ले लिया और वहा से जोधपुर पर धावा बोल दिया और थोड़े से संघर्ष के बाद जोधपुर को भी जीत लिया गया। शेरशाह ने जोधपुर की बागडोर अपने विश्वासी खवाजाखा और ईशाखा को सोप दी और खुद दिल्ली चला गया। और उधर मालदेव ने स्थिति प्रतिकूल देखते हुवे वहा से सिवाना के पर्वतीय भाग में चला गया। 


              














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